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खाना बनाईये और बना कर खिलाईये - इससे सहज कोई स्वांतः-सुखाय आध्यात्मिक कर्म नहीं

26 जून 2016   |  संतोष झा
खाना बनाईये और बना कर खिलाईये - इससे सहज कोई स्वांतः-सुखाय आध्यात्मिक कर्म नहीं


हर मूर्त, यानि टैंजिबल मैटर में कुछ कुछ अमूर्त, यानि इंटैंजिबल छुपा वा निहित होता है। यह बेहद सुखद है कि हम आप किसी मूर्त के स्वरूप को बदलना चाहें तो बेहद कठिनाई होती है मगर उसमें निहित अमूर्त को नया स्वरूप देने में कोई परेशानी नहीं होती। क्यूं कि मूर्त को बदलने में बाहरी एनर्जी की जरूरत पड़ती है जबकि अमूर्त को परिवर्तित करने के लिए सिर्फ अपनी आंतरिक चेतना को नये बोधत्व, यानि काग्निशन में ढालना होता है। किसी बाहरी माध्यम की आवश्यक्ता नहीं होती।

यह बेहद आसान काम है - हम जब किसी पत्थर मेंशिव के बोध को देख-समझ सक पाते हैं तो फिर जरूर ही इंटैजिबिलिटी बेहद आसान काम है! बस चेतना बोध के स्वरूप को बदलना होता है, कोई पहाड़ नहीं तोड़ना होता!

चलिए, जब यह हाईपोथेसिस मान ली गई है तो हम एक ऐसी प्रक्रिया की चर्चा कर लें जिससे इस मूर्त-अमूर्त की अवधारणा का आम जीवन में लाभ समझा जा सके। हम सब के जीवन में एक बेहद जरूरी मूर्त स्वरूप है वह है - खाना बनाना। अमूमन, शुरुआत से ही पुरुष को लगता रहा है कि खाना बनाना उसका काम नहीं बल्कि यह कार्य परंपरा से स्त्रियों का है। चूंकि, परंपरा से यह काम स्त्रियोचित करार दिया जा चुका है, इसलिए अब, बहुत सी आधुनिक महिलायें खाना बनाने के प्रति एक बगावती नजरिया रखने लगी हैं। उन्हे लगता है कि खाना बनाने से वे वह जंग हार जायेंगी, पुरुष से बराबरी की जंग, जिसके लिए उन्हें हर क्षे़त्र में लड़ाई लड़नी पड़ रही है। तो, अब हालात यह हैं कि कोई भी खाना बनाना नहीं चाहता क्यूं किहारना कोई भी नहीं चाहता! यानि, ‘शिव को वापसपत्थर बनाने की जिद लिए बैठे हैं सभी!

अब देखिए, एक बेहद सहज-सरल-सुगम मूर्त तत्व, बेचारा कितने जटिल जुझारू अमूर्तता के पचड़े में फंस कर जार-जार हो रहा है। भई कमाल है, खाना तो सभी खाते हैं, पुरुष हो या स्त्री। भूख तो बेहदजेंडर-न्यूट्रल तत्व है। मगर, भूख जैसेआब्जेक्टिव मूर्तता को भी हम मनुष्य अपनीसब्जेक्टिव चेतना के कपटी बोधत्व का जामा पहना कर ऐसी बहुआयामी अमूर्तताओं के हवाले कर देते हैं जो अनंत जंगों का सबब बन जाती है।

विश्वास कीजिये, पुरुष हो या स्त्री, खाना बनाना बेहद आध्यात्मिक कर्म है। सिर्फ शास्त्रों में कहा गया है, बल्कि वैज्ञानिक पहलू भी है कि खुद को जिंदा रखना हर जीव मात्र का प्रथम कर्तव्य है। यानि, भूख हमें अपने प्रथम कर्तव्य की याद दिलाता है। मगर, खाना बनाना, जो कि मूलतः इसी कर्तव्य की पूर्ती का बेहद जरूरी कर्म है, उसे करने से हम सब भागते फिरते हैं और इस पवित्र कर्म कोनकारेपन का दर्जा देने को लालायित रहते हैं। क्यूं भला?

वह इसलिये कि हमारे अवचेतन मन में यह बात परंपरा से बैठा दी गई है कि इंसानों के जरूरी कर्म उसके स्त्री या पुरुष होने पर निर्धारित होते हैं। यानि, खाना बनाना स्त्रियों का कर्म है और खाना खाना और मीन-मेख निकालना पुरुषों का! ऐसा भला किस किताब में लिखा है?

जीवन और इसके सभी जरूरी कर्म एक तरह से आध्यात्मिकता से जुड़े हैं। अपना काम खुद करना अपने कर्म के प्रति कर्तव्यनिष्ठा का प्रमाण है। और इससे भी मजेदार बात यह है कि खाना बनाना बेहद सुकूनदेह कर्म है। कहते हैं, मां के हाथों से बने खाने का स्वाद और उस खाने के साथ जो ममता का सुख है, उसके लिए खुद भगवान भी लालायित रहते हैं। तो भला हम इंसान क्यूं भागते फिरते हैं इस सुख से? औरत हो या मर्द, ममता का सुख तो हर किसी को सुख ही देगा। एक बाप अपनी प्यारी सी बिटिया को गर्मागरम परांठे बना के ममत्व से खिलाये तो क्या वह बाप वैसा ही सुख नहीं पायेगा जैसा एक औरत पायेगी? तो फिर झूठे गुमान और मर्दानगी में क्यूं खुद को इस सुख से महरूम करें पुरुष।

और महिलायें अगर खुद को साबित करने के लिए, पुरुष की सनातन मूर्खताओं से तथाकथित बराबरी करने के दंभ में इस नैसर्गिक सुख से स्वयं को वंचित करती हैं, तो भला इसमें कैसी होशियारी और इंटैलिजेंस है?

विश्वास कीजिये, खाना बनाना किसी योगकर्म से कम नहीं। कर के देखिये, खाना बनाना किसी यज्ञ से कम पावन हितकारी नहीं है। इसे जरा समझिये और फिर स्वयं कर के देखिये। मैं आपको अपनी आपबीती सुनाता हूं -

मेरे दफ्तर में उस दिन बोर्ड के चेयरमैन और कई डायरेक्टर्स मौजूद थे। मुझे अपने पूरे जोन की डेवलप्मेंटल प्रेजेंटेसन देनी थी। सुबह जब मैं आफिस के लिये तैयार होने लगा तो अम्मा ने बांह पकड़ कर कहा - ‘जाने से पहले जरा यह मटर छील कर जाना। देखा तो पूरा एक किलो मटर था। नानुकुर की गुंजाईश ही नहीं थी। अम्मा तो हर बास से उपर होती है। मैं काफी नर्वस भी था और इरीटेटेड भी कि पता नहीं दिन कैसा जायेगा और कही प्रेजेंटेसन पिट गया तो बड़ी भद पिटेगी। खैर, मटर छीलना शुरू किया। प्रारंभ में तो बड़ी कोफ्त हुई मगर आधे मटर छीलते-छीलते ही यह अहसास होने लगा कि कुछ अंदर ही अंदर शांत होने लगा है। फिर मटर छीलने में मजा भी आने लगा। फिर महसूस हुआ कि जो सुखद अहसास बन रहा था, वह इसलिए था कि मैं शायद बेकार ही वक्त में जी कर आगे के समय में जी रहा था और आने वाले वक्त की आशंकाओं को लेकर अपना वर्तमान समय बैचेनी में गंवा रहा था। मगर मटर छीलने के क्रम में जो एक रिदम, एक तारतम्य बना, लम्हों के साथ जो जुड़ाव बना, उससे मैं पुनः वर्तमान में जीने को मजबूर हुआ। मेरी चेतना वापस अपना समता पा सकी। मैं स्वयं के करीब पाया। और फिर, उस दिन आफिस में बाॅसेस और सीनियर्स की जो तालियां मिलीं, उससे मटर से जिंदगी भर की दोस्ती हो गई। अम्मा को शायद यह सब पहले से पता था। मटर तो बहाना था।

यह हुनर शायद महिलाओं को स्वभावगत आता है। हमारी भांजी का आईआईटी का रिजल्ट निकला अैर वह अच्छे रैंक से पास हुई। हमारी बहन जी ने सुना और फिर अपनी बिटिया से बेहद निर्विकार भाव से कहा - ‘चलो अब मन निश्चिंत हो गया। तो पहले घर में झाड़ू लगा लो और फिर रोटियां सेंक लेना। आज भी बिटिया जबअनसैटल्ड होती है तो फट से पूरे घर में झाड़ू लगाने लग जाती है। हर बार उसका चित्त शांत हो जाता है और वह अपने सम-चेतना निश्छल बोध को वापस पा जाती है।

चेतना को समता भाव में लाने के लिए, जीवन के जो बेहद जरूरी कर्म होते हैं, वही सबसे ज्यादा सहायक होते हैं। कभी मन बेहद अशांत हो, बहुत टेंशन महसूस हो, तो गाना गाते हुए, अपने बाथरूम का कमोड साफ करने लगिये। विश्वास कीजिये, इस मूर्तता से जो अमूर्त भाव उपजेगा, वह आपको सहज-सरल-सुगम चेतना में वापस ले जायेगा। आप हल्का और सुख महसूस करेंगे।

खाना बनाना और खाना बना कर खिलाना, यह जो हम इंसानों का सबसे मूल कर्म है, यह ही हमारा सबसे सहज-सरल-सुगम आध्यात्म है। जीवन की उपलब्धियां स्वांतः-सुखाय होती हैं। जिस उपलब्धि से आंतरिक समता भाव उपजे, स्वयं की चेतना को अमूर्त संतोष हासिल हो सके, यह सार्थक नहीं है।

तो, कुल जमा बात इतनी सी है कि कोई मूर्त हमें वही सुख-संतोष दे पाता है जैसी हमारी चेतना उसका बोध। और चेतना बोध सिर्फ हमारे अपने हाथ में हैं। मूर्त को बदलने में बाहरी एनर्जी की जरूरत पड़ती है जबकि अमूर्त को परिवर्तित करने के लिए सिर्फ अपनी आंतरिक चेतना को नये बोधत्व में ढालना होता है। किसी बाहरी माध्यम की आवश्यक्ता नहीं होती। बेहद आसान काम है। आईये, हम सब इसे करते हैं - स्त्री हों या पुरुष, कोई फर्क पड़ता है क्या? सुख-संतोष भी क्या स्त्री या पुरुष होता है?

संतोष झा

ऐसा प्रतीत होने लगा है कि संभवतः, अब मैं उम्र के उस मुकाम पर आ पाया हूं, जहां ऐसा कुछ लगने लगा है कि मैं शायद थोड़ा कुछ समझ पाने लग गया हूं, जो यहां समझने के लिए है...   कहने को मैंने 28 ईबुक्स लिखी हैं अब तक, जो अंग्रेजी में हैं, मगर मैं उन्हें आपसब से बातचीत ही मानता हूं। क्यूं कि मूलतः मैं लेखक नहीं, बल्कि सहज-सरल इंसान हूं, जिसे गुफतगूं के सिलसिले के खुशनुमेंपन और सार्थकता-उपयोगिता पे भरोसा है। हिंदी में लिखने में एक अजीब सा अपनापन है। वैसे तो कुछ भी लिखने में थोड़ा डरता हूं क्यूं कि शब्दों द्वारा लेखन के माध्यम से भावाव्यक्ति की सार्थकता का मैं बहुत कायल नहीं। हालांकि, हिंदी मुझे आती नहीं, लेकिन इस भाषा में लिखने में वैसा डर नहीं लगता। वैसे तो अंग्रेजी भी कहां आती है! मेरा सारा लेखन, चाहे वह फिक्शन हो या नान-फिक्शन, मूलतः तीन तत्वों के इर्दगिर्द ही घूमती है, वह हैं - चेतना, बोधत्व एवं चित्त की वृत्तियां। मैं मानता हूं कि लेखन की सफलता शायद इसमें उतनी नहीं है कि कितने लोग आपको पढ़ते हैं बल्कि संभवतः इसमें है कि आपके शब्द कितने विविध तरीकों से लोगों की मदद कर सकते हैं। इसलिए ही ईबुक्स ही लिखने का मेरा चेतन निर्णय रहा। Find my books (fiction and non-fiction), ALL of them FREE at: https://www.smashwords.com/profile/view/SantoshJha

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