सूर्योपनिषद् - 2

27 जून 2016   |  डॉ उमेश पुरी 'ज्ञानेश्‍वर'   (186 बार पढ़ा जा चुका है)

सूर्योपनिषद् - 2


    ॐ भूर्भुवः सुवः। ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमिहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ।।2।। 

   जो प्रणव रूप में सच्चिदानन्द परमात्मा भूः, भुवः, स्वः रूप त्रिलोक में संव्याप्त है। समस्त सृष्टि के उत्पादन करने  वाले उन  सवितादेव  के सर्वोत्तम  तेज का  हम ध्यान करते हैं, जो(वे सविता देवता)हमारी बुद्धियों को श्रेष्ठता की दिशा में  प्रेरणा प्रदान करें। ऐसा ध्यान करने  वाला साधक ब्रह्मनिष्ठ विदेह  मुक्त  हो  जाता है।


  भाग एक के लिए नीचे लिखे लिंक पर क्लिक करके पढ़ें-

 

    सूर्योपनिषद अथर्ववेदीय परम्परा से संबंध रखता है। इस उपनिषद में आठ श्लोकों में ब्रह्मा और सूर्य की अभिन्नता वर्णित है और बाद में  सूर्य  व  आत्मा  की अभिन्नता प्रतिपादित की गई है। इस उपनिषद के पाठ के लिए हस्त नक्षत्र स्थित सूर्य का समय अर्थात् आश्विन मास सर्वोत्तम माना गया है।  इसके पाठ  से व्यक् सूर्योपनिषद् १

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