वो अँधेरे से उजाला माँग बैठा, बहुत भूखा था निबाला मांग बैठा|

27 जून 2016   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (438 बार पढ़ा जा चुका है)


मेरी याद दिल से भुलाओगे  कैसे,

गिराकर नज़र से उठाओगे कैसे|


सुलगने ना दो ज़िन्दगी को ज्यादा,

चिरागों से घर को बचाओगे  कैसे  

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उत्तम.

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मि
मिलावटी खाद्यान्न खाते-खाते इन्सान भी दिन-प्रतिदिन मिलावटी होते जा रहे हैं। यह पढ़-सुनकर तो एकबार हम सबको शाक लगना स्वाभाविक है। यदि इस विषय पर गहराई से मनन किया जाए तो हम हैरान रह जाएँगे कि धरातलीय वास्तविकता यही है। हम मिलावटी हो रहे हैं यह कहने के पीछे तात्पर्य है कि हम सभी मुखौटानुमा जिन
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06 जुलाई 2016
ख़ुशी और ग़म सब खुदा की महर है,जिओ प्यार से ज़िन्दगी मुख़्तसर है। हुनर आप में है खुदी को तराशो,तुम्हारा मुक़द्दर तुम्हारा हुनर है। समझ सोच कर वक़्त को आजमाना,दवाओं की तासीर में भी ज़हर है। मिरे साथ में भी यही कशमकश है  लगे है  पराया मगर अपना घर  है। हवा और पानी बदल कर तो  देखो,सुबह की बहर में ग़ज़ल  दोपहर है
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09 जुलाई 2016
कौन जाने  आग पानी कब तलक,     बेवफ़ा ढलती  जवानी  कब तलक।  आज  खोलें चाहतों की सीपियाँ,मोतियों की महरबानी कब तलक।  रौशनी के पर लगाकर तितलियां,  खोजती अपनी निशानी कब तलक हाथ में खंजर उठाकर चल दिये,इस तरह रश्में निभानी कब तलक।  टूट जाते हो खिलौनों की तरह,अस्थि पिंजर हैं छुपानी कब तलक। क़ैद से बागी  परिं
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29 जून 2016
ज़हर  पीता रहा ,पर कहा कुछ नहीं,आज हिस्से में गम के सिवा कुछ नहीं। दिखते  बेदाग़  दामन,सभी के यहां, चोर  है  कौन  साहू पता कुछ नहीं। ज़ुल्म  से  है हर इक शै,परेशां  मगर , अब  यकीं हो गया है ख़ुदा कुछ नहीं। ज़िन्दगी आज फिर जश्न तुमको मुबारक़ , मैं   तड़पता   रहूँ   तो   गिला  कुछ  नहीं। कारवां  में  बहुत दि
29 जून 2016
27 जून 2016
हम झुका दे आसमां ,वो हौंसला रखता हूँ मैं ,आग सीने में नज़र में जलजला रखता हूँ मैं ।कौन जाने किस तरह ,वो पेश आयें इसलिये ,म्यान से बाहर जुरुर खंजर खुला रखता हूँ मैं।आप भी समझोगे,पानी की अहमियत एकदिन ,प्यास -पानी में बड़ा सा,फासला रखता हूँ मैं।ना भूल न जाऊं कहीं खुद पर ज़माने के सितम,बात इतनी सी है ज़खमों
27 जून 2016
11 जुलाई 2016
आज मुझसे  मिरा सामना  हो गया,अजनबी-अजनबीं आशना हो गया। मैं समझाऊँ कैसे तुम्हें ज़िन्दगी,         सोचना प्यार करना मना हो गया दर्द दीवार बनके खड़ा राह में, बहुत मुश्किल इसे तोडना हो गया। मत संभालो मुझे मर्जियां आपकी,गैर मुमकिन तुम्हें भूलना हो गया।मौज सागर की साहिल लगीं ढूंढने, हाय  तूफान  का लौटना हो
11 जुलाई 2016
20 जून 2016
यो
उसका नाम है रामदीन. वह भी ''योगासन'' करना चाहता है पर अभी वह ''भूख-आसन'' का शिकार है. उसे देख कर यह कविता बनी  -भूखे को रोटी भी दे दो,फिर सिखलाना योग .बड़ा रोग है एक गरीबी, चलो भगाएं रोग.खा-पीकर कुछ अघा गए हैं, अब सेहत की चिंता जो भूखे हैं उन लोगो को कौन यहां पर गिनता। पहले महंगाई से निबटो, भ्रष्टाचा
20 जून 2016
13 जून 2016
मत उसूलों को पाबन्द इतना करो, खोल दो मुठ्ठियां और जिद ना करो। अच्छे   लगते   हैं  उड़ते परिंदे मगन,ये हवा क़ैद तुम आज अब ना करो। ले  चलो नाव को उस किनारे तलक,  ठीक  मंझ्धार  में   मत  बहाना  करो। है     बहुत    खूबसूरत  सुहाना   सफ़र, यार रिश्तों को फिर आशिक़ाना करो।  रहने   दो  इल्म  को  आन - ईमान  पर,
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एक बार एक किसान की घड़ी कहीं खो गयी. वैसेतो घडी कीमती नहीं थी पर किसान उससे भावनात्मक रूप सेजुड़ा हुआ था और किसी भी तरह उसे वापस पाना चाहता था.उसने खुद भी घडी खोजने का बहुत प्रयास किया, कभी कमरे मेंखोजता तो कभी बाड़े तो कभी अनाज के ढेर में ….पर तामामकोशिशों के बाद भी घड़ी नहीं मिली. उसने निश्चयकिया
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दर्द देती रही ये ख़ुशी  उम्र भर,ना बुझी ना जली रौशनी उम्र भर। बात दिल की सुनी-अनसुनी हो गई,  आप करते रहे दिल्लगी उम्र भर।  ठोकरों  में रहा मैं तमाशा बना,यूँ तराशा गया हर घडी उम्र भर।  था सफर भी नया मोड़ भी अजनबीं, मैं भटकता  रहा बस युहीं  उम्र भर दो किनारे मगर प्यास मंझधार में,  छटपटाती रही इक नदी उम्
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कि
किसान चिंतित हैसुशील शर्माकिसान चिंतित है फसल की प्यास से ।किसान चिंतित है टूटते दरकते विश्वास से।किसान चिंतित है पसीने से तर बतर शरीरों से।किसान चिंतित है जहर बुझी तकरीरों से।किसान चिंतित है खाट पर कराहती माँ की खांसी से ।किसान चिंतित है पेड़ पर लटकती अपनी फांसी से।किसान चिंतित है मंडी में लूटते लुट
13 जून 2016
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