वो अँधेरे से उजाला माँग बैठा, बहुत भूखा था निबाला मांग बैठा|

27 जून 2016   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (394 बार पढ़ा जा चुका है)


मेरी याद दिल से भुलाओगे  कैसे,

गिराकर नज़र से उठाओगे कैसे|


सुलगने ना दो ज़िन्दगी को ज्यादा,

चिरागों से घर को बचाओगे  कैसे  

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उत्तम.

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आग   पी - पी  कर   बुझाने  आये  हैं, कुछ फ़र्ज़ इस तरह निभाने आये हैं। मासूम   या   अंजान   हैं  हालात  से,   ख़ुशी      में   आंसूं   बहाने  आये  हैं।  उनकी   चाहत   में  दिखी  दीवानगी, मौत   से   नज़रें   मिलाने    आये   हैं।  कुछ   भी  सजाएं   दो  हमें   मंजूर  है, हम तो हाल-ए-दिल  सुनाने आये  हैं। स
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मिलावटी खाद्यान्न खाते-खाते इन्सान भी दिन-प्रतिदिन मिलावटी होते जा रहे हैं। यह पढ़-सुनकर तो एकबार हम सबको शाक लगना स्वाभाविक है। यदि इस विषय पर गहराई से मनन किया जाए तो हम हैरान रह जाएँगे कि धरातलीय वास्तविकता यही है। हम मिलावटी हो रहे हैं यह कहने के पीछे तात्पर्य है कि हम सभी मुखौटानुमा जिन
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कि
किसान चिंतित हैसुशील शर्माकिसान चिंतित है फसल की प्यास से ।किसान चिंतित है टूटते दरकते विश्वास से।किसान चिंतित है पसीने से तर बतर शरीरों से।किसान चिंतित है जहर बुझी तकरीरों से।किसान चिंतित है खाट पर कराहती माँ की खांसी से ।किसान चिंतित है पेड़ पर लटकती अपनी फांसी से।किसान चिंतित है मंडी में लूटते लुट
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