मंजिल

27 जून 2016   |  डाॅ कंचन पुरी   (191 बार पढ़ा जा चुका है)

मंजिल

जिंदगी   है   इक  झरोखा झांकते रहिये।

लक्ष्य  से  भी  अपनी  दूरी  नापते  रहिये।

साथ-साथ  चलेंगे तो पा ही लेंगे  मंजिलें।

बस एक दूजे के दु:खों को  बांटते रहिये।

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