कर्म प्रधान विश्व रचि राखा

02 जुलाई 2016   |  डाॅ कंचन पुरी   (1688 बार पढ़ा जा चुका है)

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा

जीवन राह देता है पर हम उसे पकड़ नही पाते हैं।

अकर्मण्यता या आलस्य वश ऐसा होता है।

भाग्य भी पुरुषार्थ से फलीभूत होता है।

कर्म के योग से कुशलता प्राप्त होती है।

कर्म की महत्ता सर्वोपरि है। बिना कर्म के कुछ नहीं मिलता है।

ईश्वर आशीष से हमें जो यह अनमोल जीवन मिला है इसे सार्थक करने के लिए हमें कर्म को महत्ता प्रदान करनी होगी। 

सुविचार के चिन्तन से लक्ष्य का प्रादुर्भाव होता है।

लक्ष्य की प्राप्ति हेतु हमें एक योजना बनानी होगी। उस योजना के अनुरूप हमें समर्पण भाव से सतत प्रयास करना होगा तो लक्ष्य  सधेगा।

लक्ष्य साधने के मार्ग में आने वाले कंटकों को दूर करने हेतु उनके अनुरूप योजना में परिवर्तन करने पड़ते हैं पर निगाह अपने लक्ष्य पर रखनी होती है।  इस पूर्ण प्रक्रिया में लक्ष्य हमारा होता है।  

अगला लेख: उन्नति



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
20 जून 2016
मि
मिलावटी खाद्यान्न खाते-खाते इन्सान भी दिन-प्रतिदिन मिलावटी होते जा रहे हैं। यह पढ़-सुनकर तो एकबार हम सबको शाक लगना स्वाभाविक है। यदि इस विषय पर गहराई से मनन किया जाए तो हम हैरान रह जाएँगे कि धरातलीय वास्तविकता यही है। हम मिलावटी हो रहे हैं यह कहने के पीछे तात्पर्य है कि हम सभी मुखौटानुमा जिन
20 जून 2016
13 जुलाई 2016
आज फ्रेंडशिप डे नहीं पर ना जाने क्यों तुम्हे याद करने का बड़ा मन हो रहा । शायद मैं एक बुरा दोस्त हूँ या फिर स्वार्थी या दोनों जो तुम्हारी खबर नहीं लेता । पर यार तुम किस मिट्टी के बने हो जो मेरी आवाज पर दौड़ पड़ते हो । मुझसे जुड़ा हर दिन , समय और जगह तुम्हे आज भी बखूबी याद है और मैं फेसबुक के भरोसे रहता
13 जुलाई 2016
16 जुलाई 2016
व्यक्तित्व का निर्माण मूल रूप से विचारों पर निर्भर है। चिन्तन मन के साथ-साथ शरीर को भी प्रभावित करता है। चिन्तन की उत्कृष्टता को व्यवहार में लाने से ही भावात्मक व सामाजिक सामंजस्य बनता है। हमारे मन की बनावट ऐसी है कि वह चिन्तन के लिए आधार खोजता है। चिन्तन का जैसा माध्यम होगा वैसा ही उसका स्तर होगा।न
16 जुलाई 2016
27 जून 2016
जिंदगी   है   इक  झरोखा झांकते रहिये।लक्ष्य  से  भी  अपनी  दूरी  नापते  रहिये। साथ-साथ  चलेंगे तो पा ही लेंगे  मंजिलें। बस एक दूजे के दु:खों को  बांटते रहिये।
27 जून 2016
13 जुलाई 2016
ते
हर समस्या का समाधान होता है , कहना आसान है मगर असल में कर पाना हर बार उतना भी सरल नहीं होता ! खासकर तब जब वो भीड़ का उन्माद हो या फिर कट्टर धार्मिकता से पैदा किया गया जूनून ! समाधान असम्भव तब हो जाता है जब समस्या जबरन पैदा की गयी हो ! कहा भी जाता है की पागलपन का कोई इलाज नहीं !लेकिन इस चक्कर में किसी
13 जुलाई 2016
13 जुलाई 2016
1. झुठकाना   क-झूठ बोलना ख-गोबरग-भ्रम में डालना  2.झौर क-गन्‍दगी  ख-समूह ग-झटका 3. टल्‍लेबाजी  क-बहानेबाजी   ख-कीड़ा ग-झूमना 4. टसुआ     क-टेसू के फूल ख-भारी वस्तु  ग-आंसू  उत्तर 1. ग   2. ख 3. क 4. ग
13 जुलाई 2016
18 जून 2016
😂झूठ बोलना …बच्चों के लिए … पाप ,,कुंवारों के लिए …. अनिवार्य ,,प्रेमियों के लिए ….. कला ,,और …शादीशुदा लोगों के लिए … शान्ति से जीने का मार्ग होता है....!!""✋ये है इस हफ्ते का साप्ताहिक ज्ञान।बड़ी मुश्किल से ढूंढ़ कर निकाला है।गीता में लिखना रह गया था।
18 जून 2016
22 जून 2016
मित्रो प्रस्तुत है एक नवगीतसच ही बोलेंगे-------------------हम अभी तक मौन थे अब भेद खोलेंगेसच कहेंगे सच लिखेंगे सच ही बोलेंगेधर्म आडम्बर हमें कमजोर करते हैंजब छले जाते तभी हम शोर करते हैंबेंचकर घोड़े नहीं अब और सोंयेंगेमान्यताओं का यहॉ पर क्षरण होता है घुटन के वातावरण कावरण होता हैऔर कब तक आश में वि
22 जून 2016
27 जून 2016
जिंदगी   है   इक  झरोखा झांकते रहिये।लक्ष्य  से  भी  अपनी  दूरी  नापते  रहिये। साथ-साथ  चलेंगे तो पा ही लेंगे  मंजिलें। बस एक दूजे के दु:खों को  बांटते रहिये।
27 जून 2016
20 जून 2016
          प्रेमचन्द हिन्दी के प्रथम मौलिक उपन्यासकार हैं। उन्होंने एक क्रमबद्ध एवं संगठित कथा देने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है। उन्होंने हिन्दी के पाठकों की अभिरुचि को तिलिस्मी उपन्यासों की गर्त से निकालकर शुद्ध साहित्यिक नींव पर स्थिर किया। उनकी कला, उनका आदर्शवाद, उनकी कल्पना और सौन्दर्यानुभूति
20 जून 2016
16 जुलाई 2016
व्यक्तित्व का निर्माण मूल रूप से विचारों पर निर्भर है। चिन्तन मन के साथ-साथ शरीर को भी प्रभावित करता है। चिन्तन की उत्कृष्टता को व्यवहार में लाने से ही भावात्मक व सामाजिक सामंजस्य बनता है। हमारे मन की बनावट ऐसी है कि वह चिन्तन के लिए आधार खोजता है। चिन्तन का जैसा माध्यम होगा वैसा ही उसका स्तर होगा।न
16 जुलाई 2016
20 जून 2016
1. झंझा  क-बहाव  ख-कष्ट   ग-आंधी  2. झक्की क-पागल ख-सनकी ग-विक्षिप्त 3. झलका क-छाला, फफोला   ख-चोट ग-कटा हुआ 4. झांसा       क-मारना ख-दौड़ाना ग-धोखा उत्तर 1. ग  2. ख 3. क 4. ग
20 जून 2016
30 जून 2016
आजकल हमारे देश में नौजवानो के लिए साहित्य से लगाव ही नहीं |कविता,कहानी क्या है जानते ही नहीं |न लेखक को पहचानते हैं न कवि को |साहित्य से दूर ही रहते हैं वो तो आजकल अश्लील वीडियो ,अश्लील मूवीज एंव भोजपुरी के अश्लील गाने एंव फिल्मो को देखना पसंद करते हैं इन सबका हमारे देश मे तेजी से वृद्धि भी हो रहा ह
30 जून 2016
19 जून 2016
जाति एक भ्रान्ति है-मानव को मानव से तोड़ने की, मानवता से मोड़ने की, भेदभाव से जोड़ने की। यह सार्वभौमिक सत्य है-हर धमनी में दौड़ता खून लाल है। समानता की सबसे बड़ी मिसाल है। सर्वधर्म, समभाव की भावना यह होगी सबकी कामना तब वो दिन दूर न होगा- जब एकता के वटवृक्ष उगेंगे शान्ति के दीपक जलेंगे और इस जाति नाम
19 जून 2016
21 जून 2016
योग व्यक्ति को तन और मन से जोड़ता है। तन से जुड़ने का का मतलब है शरीर की देखभाल इस देखभाल से स्वास्थ्य अच्छा रहता है और मन सेे जुड़ने का मतलब है मन की एकाग्रता। इस प्रकार तन और मन पर व्यक्ति का नियंत्रण हो जाता है जिससे संयम, विवेक और साहस बढ़ता है और व्यक्ति स्वस्थ व प्रसन्नचित्त रहता है। वस्तुतः यो
21 जून 2016
10 जुलाई 2016
प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रशंसा चाहता है। सही अर्थों में प्रशंसा एक प्रकार का प्रोत्साहन है! प्रशंसा में सृजन की क्षमा होती है। इसलिए प्रशंसा करने का जब भी अवसर मिले उसे व्यक्त करने से नहीं चूकना चाहिए। प्रशंसा करने से प्रशंसक की प्रतिष्ठा बढ़ती है। सभी में गुण व दोष होते हैं। ऐसा नहीं है कि बुरे से ब
10 जुलाई 2016
26 जून 2016
सत्य की सड़क मिथ्या की चाैखट पर पहुंचकरमात्र एक गैलरी रह जाती हैऔर शेष भूमि परकविताएं लिख दी जाती हैं,कविताएंजो कभी भी किसी भी सूरत मेंसड्कें नहीं बन सकतीं।प्रशस्ति पत्रों से लिपटी सहमी ग्रामीण दुल्हनों जैसी जीवन भर चक्की पीसती रहती है, रोटियां पकाती रहती है और उधर मिथ्या की काली गैलरी में जेबें काट
26 जून 2016
10 जुलाई 2016
प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रशंसा चाहता है। सही अर्थों में प्रशंसा एक प्रकार का प्रोत्साहन है! प्रशंसा में सृजन की क्षमा होती है। इसलिए प्रशंसा करने का जब भी अवसर मिले उसे व्यक्त करने से नहीं चूकना चाहिए। प्रशंसा करने से प्रशंसक की प्रतिष्ठा बढ़ती है। सभी में गुण व दोष होते हैं। ऐसा नहीं है कि बुरे से ब
10 जुलाई 2016
23 जून 2016
डाॅ. केनेथ वाकर ने अपनी आत्मकथा में कहा है-‘आप जितना खाते हैं उसके आधे भोजन से पेट भरता है और आधे भोजन से डाॅक्टरों का पेट भरता है। आप आधा भोजन ही करें तो आप बीमार ही नहीं पड़ेंगे और डाॅक्टरों की कोई खास आवश्यकता नहीं रह जाएगी।’ डाॅ. केनेथ की यह बात अनुभूत है और व्यवहारोपयोगी है। सच में भूख से कम खा
23 जून 2016
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x