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इन्सान ही प्रश्न और इन्सान ही उत्तर

04 जुलाई 2016   |  निरंजन

उत्तराखण्ड में हो रही‌ तबाही २०१३ के प्रलय की याद दिला रही है| एक तरह से वही विपदा फिर आयी है| देखा जाए तो इसमें अप्रत्याशित कुछ भी नही है| जो हो रहा है, वह बिल्कुल साधारण नही है, लेकिन पीछले छह- सात सालों में निरंतर होता जा रहा है| हर बरसात के सीजन में लैंड स्लाईडस, बादल फटना, नदियों को बाढ और जान- माल का नुकसान ये बातें अब आम हो गई‌ हैं| फर्क तो सिर्फ इतना है कि इन बदलावों का अनुपात तेज़ी से बढ रहा है| उनकी फ्रिक्वेन्सी बढ गई‌ है| नुकसान भी बहुत बढ रहा है| पर्यावरण पर हो रहे इन परिणामों को रोकने के क्या उपाय है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर क्या है? उसका एक ही उत्तर है और वह है हम| हम ही‌ इसे रोक सकते हैं क्यों कि यह सब हमने ही किया है| चाहिए बरसात तबाही‌ ला रही हो, उस बरसात के कारण हम ही है और हम ही इसे चाहे तो रोक भी सकते हैं|


जैसे हमने पीछले लेखों‌ में चर्चा की, पर्यावरण और मानव के बीच काफी‌ तनाव है| मानव का पर्यावरण पर बर्डन बढ रहा है| अगर इन सभी बातों में परिवर्तन करना हो तो पर्यावरण के साथ तो काम करना ही होगा- जैसे पेड़ लगाने होंगे, जल संवर्धन के प्रयास करने होंगे, जंगल बचाने होंगे; लेकिन उसके साथ इन्सान की समझ और इन्सान की दृष्टी बढाने के भी प्रयास करने होंगे| तब जा कर धीरे धीरे इन्सान प्रकृति पर कर रहा है उस आक्रमण को समझ पाएगा और उससे यु- टर्न ले सकेगा| पर्यावरण की रक्षा का यह लाँग टर्म फोकस हो सकता है| शॉर्ट टर्म फोकस अर्थात् पर्यावरण के साथ काम करना होगा| इस लेख में इन्सान की दृष्टी और सजगता बढाने के प्रयासों पर एक नजर डालेंगे|





इन्सान वैसे एक प्राकृतिक प्राणी ही है, लेकिन उसकी बुद्धी और उसका मन उसे प्रकृति से अलग स्थान देता है| और इसी कारण इन्सान और प्रकृति के बीच तनाव होता है तथा इन्सानों के बीच भी आपस में तनाव होता है| और इन्सान स्वयं को प्रकृति से अलग मान कर उस पर 'विजय' हासील करने की‌ चाह से भर जाता है| आज तक के इतिहास में इन्सान की दृष्टी और सजगता बढाने के कई प्रयास किए गए हैं| इसका पूरा विज्ञान आज उपलब्ध है| इसकी तकनिक विकसित की गई है| लेकिन यह विज्ञान अलग तरह का विज्ञान है| यह स्वयं के भीतर खोजबीन करनेवाला विज्ञान है| 


हमे जिस विज्ञान का पता होता है वह तो प्रयोगशाला में चीरफाड़ करनेवाला विज्ञान है| जैसे हम किसी पत्ते का अध्ययन करते हैं तो उसे काट कर लैबोरेटरी में ले जाते हैं| फिर उसका अन्वेषण करते हैं| लेकिन भीतर खोजबीन करनेवाला विज्ञान बहुत अलग ढंग का है| उसमें स्वयं को ही खोजना होता है| लेकिन अक्सर कई आध्यात्मिक मार्गों के नाम और विभिन्न पद्धतियों के कारण इससे सम्भ्रम होता है| जैसे हम मानते हैं कि हिंन्दु, इस्लाम, बौद्ध, जैन, ईसाई, सीक्ख ये सब अलग धर्म हैं और बाहर से कितना भी कुछ कहें, हम मन में मानते हैं कि ये सब सही नही हैं| जब की सच्चाई यह है कि ये धर्म है ही नही; ये तो पंथ हैं; ये तो रास्ते या उस शिखर की ओर जानेवाले विभिन्न रूटस हैं| और धर्म अनेक कैसे हो सकता है? धर्म तो प्रकृति का नियम होता है- प्रकृति का गुणधर्म होता है|‌ गुणधर्म शब्द धर्म का सार दर्शाता है| ऐसे गुणधर्म जिन पर सारी प्रकृति; सारा जीवन चलता है| जैसे गुरुत्वाकर्षण एक गुणधर्म है| अगर हम इस नियम से तालमेल बिठाते हैं, तो हम आसानी से चल सकते हैं| लेकिन अगर हम इस नियम से तालमेल नही बिठाते हैं तो गिरते हैं| लाल रंग यह खून का गुणधर्म हैं, १०० डिग्री पर भांप बनना यह पानी का गुणधर्म है| इस प्रकार कोई गुणधर्म या कोई धर्म हिन्दु, इस्लाम, बौद्ध, ईसाई आदि नही हो सकता है| ये तो सब उस गुणधर्म को कहने के और उससे तालमेल बिठाने के अलग अलग तरिके हैं| उस गुणधर्म के बारे में अलग अलग लोगों ने विभिन्न समुदायों के साथ- अलग अलग समय पर जिस तरीके से बताया था, ये वे तरीके हैं| शिखर पर ले जानेवाले रूटस मात्र है| जैसे कोई पृथ्वी पर कहीं भी हो, अगर हर कोई उत्तर की ओर निकलता है, तो देर सबेर उत्तर ध्रुव तक पहुँच ही जाएगा| लेकिन उसका रूट अलग अलग होगा| 


संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि ये गुणधर्म ऐसे नियम हैं जो हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने में मदद करते हैं| मानव छोड कर अन्य सभी पशु- पक्षी- वृक्ष प्रकृति के साथ तालमेल बिठाए हुए हैं| अगर मानव इन नियमों का पालन करता हैं, तो वह भी प्रकृति से उतनाही लीन हो जाएगा और तब उसकी स्थिति अत्यंत खुशहाल होगी| ये नियम हमें ये रास्ते बताते हैं और हमारी दृष्टी और हमारी‌ समझ बढाते हैं| हमे सही रास्ता दिखाते हैं| इस रास्ते पर चलने से तनाव कम हो जाते हैं| जैसे भगवान बुद्ध ने कहा था कि दु:ख है, दु:ख का कारण है, दु:ख दूर करने के उपाय हैं और ऐसी भी अवस्था आती है जिसमें कोई दु:ख नही होता है| जन्म लेनेवाला हर बच्चा बुद्ध जैसा ही होता है- उसमें कोई अहंकार नही, कोई वासना नही और यहाँ तक की मन भी‌ नही होता है| लेकिन धीरे धीरे समाज और मानवीय सम्बन्धों के कारण उसमें अहंकार उत्पन्न होता है, वासनाएँ प्रकट होती हैं और मन बनता है| लेकिन फिर भी गहराई में होता तो वह भी बुद्ध जैसा- प्रकृति से जुड़ा| लेकिन एक दूरी आ जाती है| जैसे शरीर की एक भूख होती हैं| लेकिन हम खाते तो अपनी आदत से हैं| इससे तनाव होता है| शरीर की नीन्द होती है| लेकिन हम उस समय नही सोते हैं| इसलिए यह तनाव बढता जाता है| 


सजगता और दृष्टी देनेवाले ये मार्ग वास्तव में ऐसी तकनिक हैं जो हमें हमारे मूल स्वरूप में फिर लाती हैं| जैसे सन्त कबीर ने कहा है- "साहेब कबीर ने जतन से ओढी, ज्यो के त्यों धर दिनी चदरिया"; अर्थात् प्रकृति ने जो निर्मल रूप कबीर को दिया था, वही उन्होने फिर से पा लिया, बड़े प्रयास से समाज द्वारा लगाया गया मैल हटाया और अपना मूल रूप पाए| ऐसी ही एक तकनिक के सम्बन्ध में एक कहानि है| नागार्जुन के पास एक युवक गया। और उसने कहा कि मुझे सत्य जानना है| नागार्जुन ने कहा, "तुम एक काम करो। तू सामने यह जो छोटी—सी गुफा है इसके भीतर बैठ जा, और तीन दिन तक यही सोच कि मैं आदमी नहीं हूं भैंस हूं और भैंस हो जाओ| कुछ समझना है तो यह करना पड़ेगा, एक छोटा—सा प्रयोग है, इसके बाद फिर रहस्य खोलूंगा।" तीन दिन वह आदमी बैठा रहा; जिद्दी आदमी था। लग गया जोर से, तीन दिन न सोया, न खाया, न पीया! भूखा—प्यासा, थका—माँदा रटता ही रहा एक बात कि मैं भैंस हूं। एक दिन, दो दिन, दूसरे दिन वहां से, भीतर से भैंस की आवाज सुनाई पड़ने लगी। बाहर में गुफा से लोग झांककर देखने लगे कि मामला क्या है पू था तो आदमी ही, मगर भैंस की आवाज निकलने लगी, रंभाने लगा। तीसरे दिन जब आवाज बहुत हो गयी तब नागार्जुन उठा अपनी गुफा से, गया और कहा कि मित्र अब बाहर आ जाओ। उसने बाहर आने की कोशिश की, लेकिन बाहर निकल न पाया।


नागार्जुन ने पूछा कि बात क्या है? उसने कहा, निकलूं कैसे, मेरे सींग... दरवाजा छोटा है। नागार्जुन ने उसे हिलाया और कहा, "आंख खोल नासमझ! यह मैंने तुझसे इसलिए करने को कहा कि तुम्हे पता चले सम्मोहन क्या होता है| सत्य तो तुम्हारे पास मौजुद है| लेकिन तुम उस सत्य को नही देख पाते हो और गहरे सम्मोहन में हो| जैसे तुम भैंस नही थे, लेकिन तुमने स्वयं को भैंस मान लिया| और तब तुम्हारा भैंस होना भी सच जैसा ही लगा| लेकिन यह सम्मोहन ही था और तुम भैंस हो नही गए थे| इसी तरह सत्य तो तुम्हारे पास है ही| बस उसे देखो|" हमारा स्व- रूप ऐसा ही उपलब्ध है लेकिन हम खुद को फलां फलां मान लेते हैं और उससे तादात्म्य करते हैं| उसके कारण सब समस्याएँ होती हैं| उसके लिए हमारी आँखें खोलनी चाहिए और तब जा कर हम स्वयं की प्रकृति को भी उपलब्ध होते हैं और फिर तनाव नही रहता है| तब हमें दिखाई पडता है कि पेड़- पौधे- पहाड़ सभी हमारा ही विस्तार हैं या हम उनका ही अंग है| तब प्रकृति से तालमेल सहज होता है| 


इस लेखमाला को पढनेवाले सभी पाठकों को बहुत बहुत धन्यवाद!

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