काश कमीना काम न होता

06 जुलाई 2016

अपने प्रेमी के संग स्वच्छंद रंगरेलियां मनाने की हवस में अंधी, एक कलयुगी माँ द्वारा ,अपने मासूम बच्चों की तकिये से गला घोंट कर निर्मम हत्या करने की खबर से आहत होकर लिखी गयी और खरे कटु सत्य को उजागर करती कविता -

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@@@@@@@ काश कमीना काम न होता @@@@@@@

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काम देव के अचूक बाणों से ,जब ममता माँ की मर जाती है |

गला घोंट कर मासूमों की ,वो हत्या भी कर जाती है ||
बच्चों को जो माता अपनी ,बड़ी ममतामयी लगती है |
इस काम के कारण वो ही ,प्रेमी के संग भगती है ||
प्रेमी के संग रहने खातिर, जो बाल -हत्या कर देती है |
पोल -पट्टी खुल जाने पर ,वो जुर्म कबूल कर लेती है ||
जब तक नहीं जानते बच्चें,माँ -बाप लगते बड़े महान |
जब जान जान जाते इसको ,वे लगते है पशु समान |
जिस काम की बदौलत ही ,यह संसार सारा चलता है |
संत पुरुषों को वही काम ,सबसे ज्यादा खलता है ||
यह काम ही है जो हमसे , नाना ढोंग करवाता है |
हमें रात के अँधेरे में ,बच्चों से अलग सुलाता है ||
जो दुल्हन सबके सामने ,घूंघट-पर्दे में होती है |
वह रात को दुल्हे के संग ,बिन वसन के सोती है ||
शर्म से नारी का नाता ,सिर्फ खुले में होता है |
शयन कक्ष में यही नाता ,अपनी किस्मत को रोता है ||
इस काम के कारण हम ,जीते हैं दोहरी जिन्दगी |
नर -नारी दोनों मिल कर ,करते उसकी बन्दगी ||
एक बच्चा अगर देख ले , अपनी माँ का रति रत रूप |
मोह भंग होगा उसका माँ से ,देख उसका वो रूप-कुरूप ||
शील संकोच शालीनता की ,त्रिवेणी दिखती है नारी |
पर देख उसके रति रूप को ,भ्रष्ट हो जाता ब्रह्मचारी ||
काम के अपावन रिश्ते से ,बनता पावन रिश्तों का जाल |
फंस जाता है इस के फंदे में ,चाहे चले कोई कैसी ही चाल ||
जीवन का अस्तित्व ही , इस काम का प्रमाण है |
जनसंख्या-विस्फोट भी , इसी का परिणाम है ||
काश यह काम न होता ,तो कितना पावन जीवन होता |
ढोंग न होता जीवन में ,निर्मल सबका मन होता ||