पपीहा बोले पीहू पीहू

12 जुलाई 2016   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (503 बार पढ़ा जा चुका है)

@@@@@@ पपीहा बोले पीहू-पीहू @@@@@@ **********************************************************

 जान लिया जीवन का सार ,लोग कहते हैं इसको प्यार | 

सार बहुत ही गहरा है ,जिस पे हो गये सभी निसार || 

क्यों बचे फिर मैं और तू ,पपीहा बोले पीहू पीहू | 

बसन्त की बहारों में,सावन की फुवारों में | 

गाने वाले गाते गाते हैं ,उमंग उठती कुंवारों में || 

झूमें गाएँ मैं और तू ,पपीहा बोले पीहू पीहू | 

जो भी हमने पाया है ,प्यार की सब माया है | 

कहने वाले कहते हैं ,नशा प्यार का छाया है || 

मौज मनाएं मैं और तू ,पपीहा बोले पीहू पीहू | 

प्यार की इन राहों में ,प्रियतम की प्यारी बाँहों में | 

खोने वाले खोते हैं ,कुर्बान होते चाहों में || 

छूते एक दूजे की रूह ,पपीहा बोले पीहू पीहू | 

बसंत की जब ऋतु आती ,मीठे स्वर में तू गाती | 

मैं दीपक और तू बाती ,प्यारा मौसम बरसाती || 

ज्योति जलाएं मैं और तू ,पपीहा बोले पीहू पीहू | 

रूह हमारी सुख पाती ,प्यार हमारा करामाती |

 जब जब खुशियाँ घर आती ,मैं नाचता और तू गाती|| 

धूम मचाएँ मैं और तू पपीहा बोले पीहू पीहू | 

उन्नति की राहों में ,कांटें चुभतें पावों में | 

रुकने वाले रुकते हैं ,तू ना रुकना छांवों में || 

गाना सुर में तुरु तुरु ,पपीहा बोले पीहू पीहू | 

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उन्नति की राहों में ,कांटें चुभतें पावों में |
रुकने वाले रुकते हैं ,तू ना रुकना छांवों में ||
गाना सुर में तुरु तुरु ,पपीहा बोले पीहू पीहू |
सुन्दर पंक्तियाँ ,आभार "एकलव्य"

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