सुकूने दिल मुहब्बत रूह की तासीर बताती है

13 जुलाई 2016   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (270 बार पढ़ा जा चुका है)

सुकूने दिल मुहब्बत रूह की तासीर बताती है

बज़्म-ए-ग़ज़ल 'मुशायरा' कार्यक्रम

*********************

फ़िलबदीह संख्या-(122)


आदाब दोस्तों..

आज का फ़िलबदीह मुशायरा में हमारी हाजिरी  कुबूल फरमाइयेगा 


♂मिसरा♂


♂वज़्न♂

♀1222...1222...1222..1222♀


♂बहर♂

♀बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम♀


♂अरकान♂

♀मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन् मुफ़ाईलुन् ♀


♀काफ़िया - ई (स्वर) ♂

♀रदीफ़- .. है । ♂


सुकूने दिल मुहब्बत रूह की तासीर बताती है,

गजब पाकीजगी इसकी हमेशा मुस्कुराती है।


वफ़ा में बेवफा में फर्क कुछ करती नहीं है ये ,

उठाकर राह से पत्थर को भी सजदे में लाती है। 


गुनाहों से नहीं परहेज फिर भी बेगुनाह हैं वो,

शरीफों को नियति अक्सर ही शूली पर चढाती है।


तजुर्बा बहुत है फिर भी भरम में आदमीं जिंदा,

यही तो सादगी है ज़िन्दगी की सच दिखाती है।


मुनासिव हो न हो फिर नजर में नूर ही रखना,

बदल दी वक़्त ने फितरत तो रहमत काम आती है।


करो कोशिश हमेशा जीत के नजदीक पाओगे,

जुझारू को ही कुदरत भी हमेशा  आजमाती है।


मुहब्बत दर्द देती है तो देती है गुरुर भी, 

रंजो-गम बाँट लेने का हुनर भी तो सिखाती है।


फ़लक के चाँद-सूरज भी अदब से पेश आते हैं,

मुहब्बत ही हमें बेहतर पाकीजा बनाती है। 


कभी'अनुराग'हम दिल से जुदा होने न देंगे हम,

ये जिद इंसान को इक रोज मसीहा बनाती है।  

*****************************************************************************

सुकूने दिल मुहब्बत रूह की तासीर बताती है,

१२२२       १२२२        १२२२          १२२२ 

गजब पाकीजगी इसकी हमेशा मुस्कुराती है।-१ 

१२२२            १२२२        १२२२       १२२२ 

वफ़ा में बेवफा में फर्क कुछ करती नहीं है ये ,

१२२२        १२२२     १२२२              1222

उठाकर राह से पत्थर को भी सजदे में लाती है।-२  

१२२२         १२२२       १२२२           1222  

गुनाहों से नहीं परहेज फिर भी बेगुनाह हैं वो,

१२२२        १२२२     १२२२          १२२२ 

शरीफों को नियति अक्सर ही शूली पर चढाती है। -३ 

  १२२२         १२२२         १२२२             १२२२ 

तजुर्बा बहुत है फिर भी भरम में आदमीं जिंदा,

१२२२        १२२२          १२२२        १२२२ 

यही तो सादगी है ज़िन्दगी की सच दिखाती है। -४ 

१२२२        १२२२        १२२२           १२२२ 

मुनासिव हो न हो फिर नजर में नूर ही रखना,

१२२२           १२२२       १२२२      १२२२

बदल दी वक़्त ने फितरत तो रहमत काम आती है।-५ 

१२२२           १२२२       १२२२              १२२२ 

करो कोशिश हमेशा जीत के नजदीक पाओगे,

१२२२            १२२२          १२२२      १२२२ 

जुझारू को ही कुदरत भी हमेशा  आजमाती है। -६ 

१२२२           १२२२          १२२२         १२२२ 

मुहब्बत दर्द देती है तो देती है गुरुर भी,

१२२२       १२२२  १२२२       १ २२२ 

रंजो-गम बाँट लेने का हुनर भी तो सिखाती है। -७ 

१२२            १२२२      १२२२          १२२२  

फ़लक के चाँद सूरज भी अदब से पेश आते हैं,

१२२२            १२२२          १२२२     १२२२ 

मुहब्बत ही हमें बेहतर पाकीजा बनाती है। 

१२२२         १२२२     १२२२       १२२२ 

तुन्हें 'अनुराग'के दिल से जुदा होने न देंगे हम,

१२२२         १२२२           १२२२      १२२२ 

ये जिद इंसान को इक रोज मसीहा बनाती है 

१२२२          १२२२          १२२२       १२२२ 

अगला लेख: आज मुझसे मिरा सामना हो गया,



' मसीहा ' का वजन कितना है भाई

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x