ये बरखा का मौसम सजीला सजीला

15 जुलाई 2016   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (221 बार पढ़ा जा चुका है)

ये बरखा का मौसम सजीला सजीला

ये बरखा का मौसम सजीला सजीला

घटाओं में मस्ती, हवाओं में थिरकन |

वो बलखाती बूँदों का फूलों से मिलना

वो शाख़ों का लहराके हर पल मचलना ||

नशे में है डूबी, क़दम लड़खड़ाती

वो मेघों की टोली चली आ रही है |

कि बिजली के हाथों से ताधिन ताधिनता

वो मादल बजाती बढ़ी आ रही है ||

पपीहा सदा ही पियू को पुकारे

तो कोयल भी संग में है सुर को मिलाती |

जवानी की मस्ती में मतवाला भँवरा

कली जिसपे अपना है सर्वस लुटाती ||

मौसम में ठण्डक, तपन बादलों में

अम्बुआ की बौरों से झरता पसीना |

सावन की रिमझिम फुहारों के संग ही

मन में भी अमृत की धारा बरसती ||

पगलाई बौराई है सारी ही धरती

चढ़ा है नशा पत्ते पत्ते पे भारी |

कि सुध बुध को बिसराके तन मन थिरकता

तो क्यों ना हरेक मन पे छाए जवानी ||

 

https://purnimakatyayan.wordpress.com/2016/07/15

 

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