मैं सदा शून्य का ध्यान किया करती हूँ

17 जुलाई 2016   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (174 बार पढ़ा जा चुका है)

मैं सदा शून्य का ध्यान किया करती हूँ

  

मैं सदा शून्य का ध्यान किया करती हूँ,

और अनहद का आह्वाहन किया करती हूँ ||||

आशाएँ मेरी दृढ़, ज्यों खड़ा हिमाचल,

मानस का है प्रतिबिम्ब मेरे, गंगाजल |

रोकेगा मेरी गति को कौन जगत में,

मैं गिरि को ठोकर मार दिया करती हूँ ||||

मेरी गति में विद्युत् जैसा कम्पन है,

वाणी में सागर के समान गर्जन है |

बादल जैसा चीत्कार किया करती हूँ,

आँधी सा हाहाकार किया करती हूँ ||||

जग के ये सूरज चंदा चमचम तारे,

पाएँगे क्या मेरा प्रकाश बेचारे |

मैं सदा गरल का पान किया करती हूँ,

और अमृत में स्नान किया करती हूँ ||||

मुझको लख विस्मित होता है जग सारा,

क्या जाने वह मेरे सुख को बेचारा |

चिन्ताएँ मेरे पास नहीं आती हैं,

पल पल मस्ती में गान किया करती हूँ ||||

 

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