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स्वर द्वारा सफल यात्रा व कार्यसिद्धि कैसे करे?

18 जुलाई 2016   |  डॉ उमेश पुरी 'ज्ञानेश्‍वर'

स्वर द्वारा सफल यात्रा व कार्यसिद्धि कैसे करे?


     स्वर दो होते हैं-सूर्य स्वर(दायां) और चन्द्र स्वर(बायां)। 

     सूर्य स्वर दाएं नथुने से और चन्द्र स्वर बाएं नथुने से आता-जाता रहता है। 

     दोनों स्वर ढाई-ढाई घड़ी में बदलते रहते हैं।

     जिस नथुने  से श्‍वास अधिक तेजी से अन्‍दर जाए या निकले वह स्‍वर चल रहा होता है। 

     आप यात्रा करने जा रहे हों अथवा किसी कार्य के लिए घर से जा रहे हों तो ऐसे में मंगलमयी यात्रा एवं कार्यसिद्धि के लिए मन में कोई चिन्ता न करें।

यदि आप स्वर को पहचानते हैं या उसे महसूस कर सकते हैं तो उसी के अनुरूप करें यात्रा मंगलमयी ही होगी और कार्य भी सिद्ध होगा।

     यदि आप यात्रा के लिए निकल रहे हैं तो सर्वप्रथम अपना स्वर महसूस करें- 
1. यदि आपका बायां स्वर चल रहा है तो पहले बायां पैर बाहर निकालकर घर से बाहर निकलें।
2. यदि आपका दायां स्वर चल रहा है तो पहले दायां पैर बाहर निकालकर घर से बाहर निकलें।
   कहने का तात्पर्य यह है कि यात्रा को सुखद् एवं प्रसन्नतामयी बनाने के साथ-साथ मंगलमयी बनाने के लिए मात्र स्वर की पहचान करके घर से बाहर निकलते समय उसी पैर को बाहर निकालकर यात्रा प्रारम्भ करनी है जो स्वर चल रहा है।
     मूलतः यह समझ लें कि समस्त शुभ या सौम्य कार्य बाएं स्वर अर्थात्‌ चन्द्र स्वर में ही करने चाहिएं।
1.  अधिक परिश्रम युक्त कार्य एवं साहस वाले कार्य क्रूर कार्य आदि करने हो तों दायां स्वर अर्थात्‌ सूर्य स्वर का प्रयोग करना चाहिए।
2.  योग, भजन, ध्यान, जप आदि कार्य सुषुम्ना स्वर में करने से शीघ्र सिद्ध होते हैं या अच्छा प्रभाव देते हैं।
3.  चन्द्र स्वर ठंडी प्रकृति का होता है इसलिए गर्मी या पित्त जनित रोगों का शमन करता है।
4.   सूर्य स्वर गर्म प्रकृति का होता है इसलिए सर्दी या कफजनित रोगों या मन्दाग्नि के कारण उत्पन्न रोगों का शमन करता है।
5.  अचानक कोई भी पीड़ा आ जाए तो तुरन्त स्वर परिवर्तन अर्थात्‌ सूर्य स्वर चल रहा हो तो चन्द्र स्वर कर दें और यदि चन्द्र स्वर चल रहा हो तो सूर्य स्वर में परिवर्तन कर देने पर तुरन्त लाभ होता है।


डॉ उमेश पुरी 'ज्ञानेश्‍वर'

नाम-डॉ. उमेश पुरी 'ज्ञानेश्वर' जन्मतिथि-2 जुलाई 1957  शिक्षा-बी.-एस.सी.(बायो), एम.ए.(हिन्दी), पी.-एच.डी.(हिन्दी) सम्प्रति-ज्योतिष निकेतन सन्देश(गूढ़ विद्याओं का गूढ़ार्थ बताने वाला हिन्दी मासिक) पत्रिका का सम्पादन व लेखन। सन्‌ 1977 से ज्योतिष एवं वास्‍तु के कार्य में संलग्न।पुस्‍तकें प्रकाशित - ज्‍योतिष, वास्‍तु, वेद, दर्शन आदि विभिन्न विषयों पर 74 पुस्तकें प्रकाशित एवं अन्य पुस्तकें प्रकाशकाधीन। 6 ईबुक्स आॅनलाईन स्मैश बुक्स पर प्रसारित।राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में अनेक लेख, कहानियां एवं कविताएं प्रकाशित। युववाणी दिल्ली से स्वरचित प्रथम कहानी 'चिता की राख' प्रसारित। युग की अंगड़ाई हिन्दी साप्ताहिक में उप-सम्पादक का कार्य किया।क्रान्तिमन्यु हिन्दी मासिक में सम्पादन सहयोग का कार्य किया। भारत के सन्त और भक्त पुस्तक पर उ.प्र.हिन्दी संस्थान द्वारा ८०००/- रू. का वर्ष १९९५ का अनुशंसा पुरस्कार प्राप्त।  रम्भा-ज्योति(हिन्दी मासिक) द्वारा कविता पर 'रम्भा श्री' उपाधि से अलंकृत।  चतुर्थ अन्तर्राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन-१९८९ में ज्योतिष बृहस्पति उपाधि से अलंकृत। पंचम अन्तर्राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन-1991 में ज्योतिष भास्कर उपाधि से अलंकृत। फ्यूचर प्वाईन्ट द्वारा ज्योतिष मर्मज्ञ की उपाधि से अलंकृत। मेरा कथन-'मेरा मानना है कि जीवन का हर पल कुछ कहता है जिसने उस पल को पकड़ कर सार्थक बना लिया उसी ने उसे जी लिया। जीवन की सार्थकता उसे जी लेने में है।'

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