बादल

31 जुलाई 2016   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (614 बार पढ़ा जा चुका है)

बादल

उमड़ घुमड़ कर बादल छाएँ, पिऊ पिऊ पपिहा गाए |
दमक दमक दम बिजली दमके, सनन सनन पुरवा डोले ||
ये बादल के टुकड़े लगते गोरी के मुखड़े जैसे
घूँघट में जो कभी जा छिपे, और कभी घूँघट खोले |
पिघला जाता है नभ ऐसे जैसे मीत कोई बिछड़े ||
चुपके चुपके हवा वो देखो आँखमिचौली है करती
और कभी सोने सी किरणें इनको पास बुला लेतीं |
तेज़ हवाओं से देखो ये कभी लगें सिकुड़े सिकुड़े ||
कभी ये खोते, कभी ये रोते, कभी ये धरती से मिलते
कभी उछलते, कभी मचलते, और कभी हैं लहराते |
कितनी कोई कर ले कोशिश, कभी न जाएँ ये जकड़े ||

 

https://purnimakatyayan.wordpress.com/2016/07/31

 

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