रक्तबीज के जैसे दानव

02 अगस्त 2016   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (154 बार पढ़ा जा चुका है)

रक्तबीज के जैसे दानव

रक्तबीज के जैसे दानव  

 

अरे हुआ क्या, आज मनुज की रक्तपिपासा बढ़ती जाती |

नहीं जान का मोल किसी की, दानवता है बढ़ती जाती ||

इसके वहशीपन से आदमखोर दरिन्दे भी शर्माते |

इसके मुख पर दया नहीं, बस घोर क्रूरता ही मुसकाती ||

चीर हरण के साथ आज तेज़ाब भी मुख पे फेंका जाता |

ऐसा देख कुकृत्य, दु:शासन की भी हैं आँखें झुक जातीं ||

आज न कोई कृष्ण, हर तरफ़ क़ायर कौरव पाण्डव बैठे |

भीष्म द्रोण का काम नहीं, शकुनी की ही गोटी उलझाती ||

आज जगत के हाथों कितनी द्रौपदियाँ और कुन्ती बनतीं |

और बनी लावारिस कितने कर्णों की आत्माएँ रोतीं ||

चक्रव्यूह में फँस कितने अभिमन्यु बिना मौत मर जाते |

कितने अश्वत्थामाओं के मस्तक की है मणि छिन जाती ||

रक्तबीज के जैसे दानव रात और दिन बढ़ते जाते |

इनकी हुँकारों से तो धरती भी भय से थर्रा जाती ||

   

https://purnimakatyayan.wordpress.com/2016/08/02/

 

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