नदी और समंदर

02 अगस्त 2016   |  नीरज नीर   (177 बार पढ़ा जा चुका है)

नदी को लगता है

कितना आसान है

समंदर होना

अपनी गहराइयों के साथ

झूलते रहना मौजों पर


न शैलों से टकराना

न शूलों से गुजरना

न पर्वतों की कठोर छातियों को चीरकर

रास्ता बनाना


पर नदी नहीं जानती है

समंदर की बेचैनी को

उसकी तड़प और उसकी प्यास को

कितना मुश्किल होता है

खारेपन के साथ एक पल भी जीना


समंदर हमेशा रहता है

प्यासा

और भटकता फिरता है

होकर सवार अपनी लहरों पर

भागता रहता है

हर वक्त किनारों की ओर

वह करता रहता है

प्रतीक्षा 

एक एक बूंद मीठे जल की

समंदर होना भी सरल नहीं है


स्त्री और पुरुष मिलकर

बनाते हैं प्रकृति को

गम्य

.... #NEERAJ_ KUMAR_NEER

#नीरज कुमार नीर

http://kavineeraj.blogspot.in/2016/06/blog-post.html



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