अजनबी - भाग 1

04 अगस्त 2016   |  पारुल त्रिपाठी   (432 बार पढ़ा जा चुका है)

काफी समय बाद वह घर आया था बड़ी बहन की शादी में। घर में गहमा गहमी का माहौल था। काफी चहल पहल थी। ढेर सारे रिश्तेदार, गाना बजाना, नाचना लगा हुआ था। कहीं मेहंदी लग रही है, कहीं साड़ी में गोटा। कहीं दर्जी नाप ले रहा है, कोई हलवाई को मिठाइयों के नाम लिखवा रहा है। एक तरफ फूल माला वाले की गुहार, एक तरफ बैंड-बाजा वाले की आवाज़। कहीं लाल, गुलाबी, हरी साड़ियों के ढेर में से माँ हर रस्म के लिए साड़ियाँ छांट रही है। हर कोई किसी न किसी काम में लगा था। उसका मन किसी तरफ भी नहीं रम रहा था।

तभी एक खनखनाती आवाज़ कानों में पड़ी “ काम करने में मज़ा नहीं आ रहा। और ये अंताक्षरी तो काफी आउटडेटेड हो चली है। चलो काफिया मिलाते हुये काम करते हैं हैं। काम भी बोरिंग नहीं लगेगा और समय भी जल्दी कट जाएगा।“


आवाज़ वाली की तरफ नज़र डाली तो चेहरा पहचाना हुआ नहीं लगा। पर वह नाज़ुक सा खुशमिजाज़ चेहरा उसको भा गया। मन में एक हलचल सी मच गयी पता करने को कि कौन है। मन तो हुआ की तुरंत ही पहुँच जाए काफिया मिलाने पर भाभियों, मामियों के मज़ाक के डर से मन मसोस कर इंतज़ार में लग गया कि कोई और शुरू करे और बीच में मौका लगे तो वह भी उसमे शामिल हो जाए। भला हो कानपुर वाली भाभी का कि “खूबसूरत” पिक्चर की फ़ैन थीं सो फटाफट काफिया मिलाने पहुँच गयी। दो-चार और लोग भी शामिल हुये। और तभी भाभी ने आवाज़ लगाई “छुप छुप कर किसको देख रहे हो देवर जी। आ जाओ।“ मुस्कुराहट छुपाते हुये वह भी जा बैठा।


लड़की ने एक बार देखा और हँस कर आत्मीयता से बोली “जीजाजी कैसे हो? पहचाना नहीं? हाँ वैसे पहचानोगे कैसे, पहली बार ही तो मिल रहे हैं।“


“अच्छा जी तो आप हमें जानती हैं। ज़रा अपना परिचय भी करा दीजिये। और भला मैं आपका जीजा कैसे हो गया? शादी तो मेरी अभी हुयी नहीं है।“ उसने पलट कर कहा।


लड़की फिर से हँसी “जानते तो आप भी मुझे हो। पर पहचाना नहीं शायद। अच्छा परिचय करा ही देती हूँ। श्री नाम है मेरा। अब समझ गए आप मेरे जीजा कैसे हुये?


अब समझ आया उसे कि यह तो उसकी भाभी की ममेरी बहन है। भैया की शादी में परीक्षा के चलते आ नहीं पायी थी सो मुलाक़ात नहीं हुयी थी।


“अच्छा तो आप हैं श्री। घर वालों ने कान पका रखे थे आपकी तारीफ़ों से। पढ़ाई में इतनी तेज़ है, टॉपर रही है बचपन से। पढ़ाई की बात हो और आपका नाम न आए ऐसा संभव ही नहीं है। वैसे सच में तेज़ हैं आप या बस अंधों में काना राजा?”


“अंधों में कानी राजकुमारी हूँ मैं। राजा काहें को बना रहे हो भला? और तेज़ हूँ या नहीं इस से आपको क्या? आपसे कॉम्पटिशन थोड़ी न है।“


“हाँ तो मैंने कब कहा कॉम्पटिशन है। अच्छा चलो इस बात को रहने दो। कुछ हाथ बंटाते हैं। इतना काम पड़ा है।“ इतना कहकर उसने बात बादल दी। सब वापस काम में लग गए।


धीरे धीरे कर के शादी का दिन पास आता गया। श्री के साथ उसको एक अजीब सा लगाव हो गया था। प्यार तो नहीं कह सकते पर उस से बात किए बिना, उसे छेड़े बिना उसका मन ही नहीं लगता था। किसी न किसी बहाने से उसके पास जाता रहता। बाहर कुछ काम हो तब भी किसी बहाने से उसको साथ ले जाता।


शादी खुशी खुशी बीत गयी। वह वापस चला गया पर श्री की यादें साथ ले गया। उसकी खिलखिलाहट, उसकी बेपरवाह बातें, दिन भर की बकबक, किसी को भी चुप देखकर हंसा आना। हर बात याद आती थी। बीच बीच में मेसेज़ कर लेता, कॉल कर लेता, अपनी कुछ रचनाएँ भेज देता उसको। मन यही था उसका कि हमेशा श्री ही सबसे पहले उसकी कविता यें पढे। पर श्री ठहरी बेपरवाह, दुनिया और दुनियादारी से दूर – उसकी अपनी अलग ही एक दुनिया थी जिसमे थी वह, उसकी किताबें और उसके सपने।


अपनी हर नयी रचना सबसे पहले श्री को भेजता। फिर दस बार पूछता “पढ़ी क्या? पढ़ कर बताओ, कैसी लगी।“ और श्री फिर वही “हाँ समय नहीं मिला। कॉलेज में बिज़ी थी, क्लास थी, परीक्षा थी, दोस्तों के साथ फिल्म देखने गयी थी, आज “गर्ल्स नाइट आउट” थी” आदि हज़ार बातें। इसे गुस्सा तो काफी आता पर फिर सोचता “आखिर क्यूँ आता है गुस्सा? उसकी गलती भी क्या? उसकी ज़िंदगी में मेरी अहमियत इतनी ही है। कम से कम जब भी बात करो जवाब तो देती है।“ 


एक दिन इसने मज़ाकिया लहजे में बोल ही दिया “काश वो दिन आए जब सबसे पहले तुम मेरी कोई भी कविता पढ़ लो और बताओ कि कैसी लगी। इसके बाद से जवाब कुछ तत्परता से आने लगे। इससे  मन को कुछ सांत्वना मिली। मन ही मन सोचने लग गया कि अगर उसको मेरी बात से इतना फर्क पड़ता है तो कुछ तो होगा ही उसके मन में भी। यही सोचता और खुश हो लेता।


साथियों को भी उसमे बदलाव दिखने लगा था। कहाँ पहले का शांत, अंतर्मुखी लड़का, और कहाँ यह हर वक़्त हँसता, मज़ाक करता, गुनगुनाता, सबको छेडता हुआ रोमियो। सब पूछते कौन मिल गयी और वह कहता बस समय आने दो सब बता दूँगा।


और फिर एक दिन अचानक उसकी यह खुशनुमा दुनिया चकनाचूर हो गयी। पहाड़ सा ही टूट पड़ा उस पर जब श्री ने अपनी सगाई का न्योता भेजा। काफी मिन्नतें की थीं कि ज़रूर आए। उसके सा कोई दोस्त श्री का है नहीं जो उसके विषय में इतना सोचता हो। इसलिए आना ज़रूरी है। फिर उसकी राय भी तो चाहिए थी लड़के के बारे में। अगर उसको पसंद नहीं आया तो?


(आगे जारी...) 

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