आओ मिलकर झूला झूलें

05 अगस्त 2016   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (314 बार पढ़ा जा चुका है)

आओ मिलकर झूला झूलें

आओ मिलकर झूला झूलें ।

ऊँची पेंग बढ़ाकर धरती के संग आओ नभ को छू लें ।।

कितने आँधी तूफाँ आएँ, घोर घनेरे बादल छाएँ ।

सबको करके पार, चलो अब अपनी हर मंज़िल को छू लें ।।

हवा बहे सन सन सन सन सन, नभ से अमृत बरसा जाए ।

इन अमृत की बून्दों से आओ मन के मधुघट को भर लें ।।

ऊदे भूरे मेघ मल्हार सुनाते, सबका मन हर्षाते ।

मस्त बिजुरिया संग मस्ती में भर आओ हम नृत्य रचा लें  ।।

हरा घाघरा पहने नभ के संग गलबहियाँ करती धरती ।

आओ हम भी निज प्रियतम संग मन के सारे तार जुड़ा लें ।|

बरखा रानी छम छम छम छम पायल है झनकाती आती ।

कोयलिया की पंचम के संग हम भी पियु को पास बुला लें ।।

सावन है दो चार दिनों का, नहीं राग ये हर एक पल का ।

जग की चिंताओं को तज कर मस्ती में भर आज झूम लें ।।

 

https://purnimakatyayan.wordpress.com/2016/08/05/

 

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