"गज़ल"

05 अगस्त 2016   |  महातम मिश्रा   (83 बार पढ़ा जा चुका है)

उगे दिनों में तारे धूप, रातों को दिखाए सपना 

इश्तहारी चौराहे पर, देख लटक चेहरा अपना 
इतने नादां भी नहीं हम, छिछले राज न समझ पाएं 
गफलत में भटके हुए हैं, उतार ले मोहरा अपना।।

चिढ़ रही हैं लचरती सड़क, मौन बेहयाई देखकर 
उछलते कीचड़ के छीटें, तक दामन दरवेश अपना।।

कहीं ऐसा कुंहराम न तक, मचाएं फूदकती गलियां 
सलामत हाथों से सहला, रुक पाँव पीर कमर अपना।।

खांई बढ़ रही उन्मादी, सहन अरु सफ़र के दरमियाँ 
मंजिलें दिखा रहीं आइना, बनाओ कदर हुनर अपना।।

हर खम्भे पर टंगा है ख़त, मांजरा मजमून क्या है 
जमीन पर उतरो तो तनिक, परम परच दिखाओ अपना।।

हकीकत में हठ मिजाज को, अब जानने लगे हैं लोग 
झाँसे में लोग झुकते थे, अहंकार झुकाओ अपना।।

समाजवाद जातिवाद की, वाद भंजाए बहुत वादी
अब मानव विकासवाद का, वादन भी बजाओ अपना।।

महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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