कुछ दोहे..........

05 अगस्त 2016   |  महातम मिश्रा   (97 बार पढ़ा जा चुका है)

कुछ दोहे..........

छद्म रूप तेरा दिखा, कैसा रे इंसान
बस रौदा रौदी सड़क, खेतों में शैतान॥- 1

माँ बेटी के रूप को, जबह किया हैवान 
आती घिन है देखकर, धरती लहू लुहान॥- 2

गिरेगी कत मानवता, के होगी पहचान
न पायी लंका ऐसी, जब गए बीर हनुमान॥- 3

सेना कैसे पल रही, किसका कहाँ मकान
जरजमीन जोरू विकल, चहरों पर मुस्कान॥- 4

हर घर की बेटी बहन, भाई बाप जहान
पूछते आसमान से, तड़के साँझ विहान॥- 5

महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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गंगा यमुना कह रहीं, याद करों तहजीबहम कलकल बहते रहें, ढोते रहे तरकीबअवरुद्ध हुई है चाल, चलूँ मैं शिथिल धार   सागर संग लहराऊँ, चलूँ किसके नशीब।।  महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
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प्रदत शीर्षक- हौसला , उम्मीद , आशा , विश्वास , आदि समानार्थी दोहा मुक्तक........ हौसलों को संगलिए, उगाहुआ विश्वासचादर है उम्मीदकी, आशातृष्णा पास दो पैरों पर चलरहा, लादेबोझ अपार झुकती हुई कमरकहें, कंधाखासमखास॥  महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी    
10 अगस्त 2016
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