दिल गिरवी रख

08 अगस्त 2016   |  कुमार रोहित राज   (132 बार पढ़ा जा चुका है)


 दिल गिरवी रख दिल गिरवी रख वापस आये,  दो अनजाने नयनन मे जो कहना था कह नहि पाये , क्या कहना इस उलझन मेक्या होती है सुन्दरता कोकल ही मैने जाना था,हम कितने लल्लू थे परवो तो बड़ा सयाना था,चलते-चलते उसने मुड़कर तिरछी नजर से देखा था,फिर हौले से रुककर इकनैन कटार सा फेंका था,जो लगा था सीधे सीने मे,पर तकलीफ हुई न जीने मे,अब तो लगता है रहती इनधुक धुक करती धड़कन मेजो कहना था कह नहि पाये क्या कहना इस उलझन मेगुलबदन उस चेहरे पर इकदाग नजर हमे आया थादाग नही वो हया की लज्जतमै भी बहुत शरमाया थाबीच-बीच मे जब हवायें मुझको छूकर जाती थीदेखन की खातिर मुझकोबस पानी भरने आती थीईक छींट गिरी आ अधरो परनशा है उसका इन नजरो परअब तो लगता है चढ गई इनसांसो की हर रिदमन मे जो कहना था कह नहि पाये क्या कहना इस उलझन मे         (कुमार रोहित राज ) KUMAR ROHIT RAJ KI SAYARI : दिल गिरवी रख 

http://kumarrohitraj.blogspot.in/2016/07/blog-post_27.html

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