तराजू सम जीवन

11 अगस्त 2016   |  बबिता गुप्ता   (136 बार पढ़ा जा चुका है)

म्हारा जीवन तराजू समान हैं जिसमें सुख और दुःख रूपी दो पल्लें हैं और डंडी जीवन को बोझ उठाने वाली सीमा पट्टी हें .काँटा जीवन चक्र के घटने वाले समयों का हिजाफा देता हैं .सुख दुःख के किसी भी पल्ले का बोझ कम या अधिक होनें पर कांटा डगमगाने लगता हैं सुख दुःख रूपी पल्लों की जुडी लारियां उसके किय कर्मो की सूची हैं जो सीधे जीवन काल से जुडती हैं .मनुष्य सुखों को तलाशता हुआ ईधर उधर भटकता फिरता हैं जबकि सुख में दुःख की छाया हैं और दुखों में सुखों की संभावना होती हैं .वह दुखों की दुहाई देकर सुख शब्द से अनजान हो जाता हैं .वह हमेंशा दुःख की लडियां पुरोता रहता हैं ,कभी भी सुख नाम की माला नहीं जपता .दुखों की जीवन में ईतनी कडवाहट भर जाती हैं की जब कभी सुखों की मिठास मिलती भी हैं तो उसे भी वह कडवी महसूस होती हैं .पहाड़ जेसैदुखों पर सुख का तिनका भी ठहर भी नहीं पाटा .जबकि सुख दुःख एक दूसरे के पर्याय हैं .ईन्हे कभी भी अलग सोच भी नहीं सकते .अगर ऐसा होता तो स्मर्तियाँ भर रह जाएगीं .अपनी वैचार्गी में दुःख जता - जताकर सहानुभूति बतोरतें रहते हैं .दुःख को मोहरा बनाकर हम उसकी सच्चाई ,सबक .अनुचित बात मनवानें का राम  वाण बना लेते हैं .रिश्तें नातें बटोरने का एक जरियां हैं .आज हम दुहों प्याज के परतों की तरह जता जता कर सुखों को खोजतें रहते हैं .चौतरफा दुखों की खेंती को सुखों की खेतीं में बदलनें के लिए हमें सुख की कुदाल से जुताई करनी होगी .दोख के आसुंओं में सुखों के मोंती दूड़नाहोंगें .मन की कारीगरी में सुख दुःख के चिन्ह हैं .मनोंद्शायह हैं की आनंद ,सराहना तलाशता मानव दुखों की औढनी पसारने का मौका नहीं गंवाता .हम सुख दुःख काईतना  लावादा औढे घूमते रहते हैं की परिस्थितियां अनुकूल होनें पर भी हम उसे स्वीकार ही नहीं कर  पाते .मह दुःख का दामन छोड़ ही नही पाते .ऐसे में सुख की दुआयं कब मांगें ? व्यर्थ ही विवशता को ढोते रहते हैं .विपरीत विरोधात्मक अवस्था में रहना सहजता से सीख लेते हैं .कभी - कभी सुख की अवस्था भी दुःख को निमंत्रण देती हैं .भविष्य की चिंता करने लागतें हैं .अच्छी बातों में भी शंका जाहिर कर दुखों को अपनें ऊपर हावी होंनें देते हैं .असहजता हमारें व्यवहार में आने लगती हैं जो संकेत देती हैं अति की .जब - जब हम पर दुःख पड़ता हैं तो उससे छुटकारा पाने के लिए हम जी तोड़ से दुगनें उत्साह के साथ दिन रात एक कर देते हैं .यही सुख ढूँढने का मिलनें का रास्ता हैं .अर्थात नकारात्मक सोच में कहीं - न - कहीं सकारात्मक सोच की घंटी बज जाती हैं .जीवन को गुणवत्तात्मक बनाने के लिए नकारात्मक बिचारो के स्थान पर सकारात्मक विचारों को स्थान देना चाहिए .ईतना आश्रय दे की वो अपनी चादर फेलाकर नकारत्मक सोच को ढक दे .उसकी हल चल चादर में भी अनुभव न हो .हमारी मानवीय सभ्यता में भी अच्छें कामों के लिय पुरूस्कार और अपराधिक कर्मो के लिय प्रताड़ित कर दंड दिया जाता हैं .लेकिन भागदौड की दुनियां में सामाजिक सोच का स्थान व्यकिगत ने ले लिया हैं .सुख का महत्व दुःख से ही मालुम चलता हैं .

अगला लेख: जीवनएक अमूल्य धरोहर हैं



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
13 अगस्त 2016
जी
मौसमों की तरह बदलते जीवन में आपदाओं विपदाओं का आवागमन होता रहता हैं .फिर भी हम जीवन को त्यौहारों ,उत्सवों,पर्वो की तरह जीते हैं .जीवन त्यौहारों जैसा हैं,जिसे हम हंसी ख़ुशी हर हाल में मनाते हैं .जीवन में होली के रंगों की तरह रंग - बिरंगी सुख दुःख के किस्से होते हैं -. कभी नीला रंग खुशियों की दवा देता
13 अगस्त 2016
21 अगस्त 2016
आज का सुवचन
21 अगस्त 2016
02 अगस्त 2016
1. जरा          क-थोड़ा          ख-क्षीणता          ग-बुढ़ापा            2. जलद      क-जल        ख-बादल        ग-छाता          3. जलधि       क-समुद्र        ख-जल सदृश           ग-बादल           4. जलवाह              क-तालाब         ख-पोखर           ग-मेघ          उत्तर1. ग  2. ख 3. क 4. ग
02 अगस्त 2016
20 अगस्त 2016
आज का सुवचन
20 अगस्त 2016
10 अगस्त 2016
जि
जिंदगी गडित के एक सवाल की तरह हैं जिसमें सम विषम संख्यायों की तरह सुलझें - अनसुलझें साल हैं .हमारी दुनियां वृत की तरह गोल हैं जिस पर हम परिधि की तरह गोल गोल घूमतें रहते हैं .आपसी अंतर भेद को व् जीवन में आपसी सामंजस्य बिठाने के लिए  कभी हम जोड़ - वाकी करते हैं तो कभी हम गुणा भाग करते हैं .लेकिन फिर भी
10 अगस्त 2016
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x