जीवनएक अमूल्य धरोहर हैं

12 अगस्त 2016   |  बबिता गुप्ता   (181 बार पढ़ा जा चुका है)

 जिंदगी तमाम अजब - अनूठे कारनामों से भरी हैं .ईन्सान अपनी तमाम भरपूर कोशिशों के बाबजूद भी उस पर सवार होकर अपनी मनमर्जी से जिन्दगीं नहीं जी पाता .वह अपनी ईच्छानुसार मोडकर उस पर सवारी नहीं कर सकता .क्योकि जिन्दगीं कुदरत का एक घोडा हैं अर्थात जिन्दगीं की लगाम कुदरत के हाथों में हैं जिस पर उसके सिवाय किसी की मनमर्जी नहीं चलती .क्योकि यह घोडा कुदरत के नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकता .जीवन एक अमूल्य धरोहर हें .यह ईश्वर का दिया एक ऐसा नायाव तोहफा हैं ,जो पुनर्जन्म में किए गए पाप - पुण्यों का फल हैं .किसी भी रूप में हमारा जीवन हो उसकी हमें कद्र करनी चाहिए और ईश्वर चिंगारी जला दे .चिंगारी से उठनें वाला प्रकाश रास्ते मका हमें तहें दिल से धन्यवाद देना चाहिए की ईस संसार मेन्न्कुछ ऐसा नया करने के लिए पर्दापर्ण किया हैं जिसे लोग हमारे अपने कामों के लिए सदियों तक याद रखे .हमारा रूप - कुरूप हो उसके लिए हमें न तो भ्फ्वान को दोषी ठहराना चाहिए और न ही हमें अपने जन्म दात्री को .एक समय पश्चात हम अपना भला बुरा सोचनें लगते हैं .जिन्दगीं भर हमें अपनी जन्म जात कमियों के लिए हमें अपने आप को कोश्ते हुए जीवन की निरुद्धेश्य नहीं बनाना चाहिए और न ही माता - पिता को हर पल दोष देकर दुखी करना चाहिए .हमें अपनी कमजोरियों को चाहे वो शारीरिक हो या मानसिक या फिर सामाजिक ,सभी को दर किनार करते हुए एक ऐसी मिशाल काय्म्क्रना चाहिए जिसकी ज्वाला सोए हुए जीवन से हताश हुए लोगों में आशावादी नजरिया देखनें मे आने वाले रूकावटो को, नाकाम करने वाले ईरादों को, अपनी कोशिशों सेजला कर राख कर दे .भगवान की दी हुई ईस अनमोल ,अमूल्य काया को निधि मानकर ईसकी पूजा करनी चाहिए ,न की टिल - टिल कर मरने के लिए छोड़ देना चाहिय .यह ईश्वर का दिया हुआ प्रसाद हैं जिसे हमें दिल से स्वीकार करना चाहिए न की हमें तिरस्कार करके धूल - धूसरित होने के लिए फ़ेंक देना चाहिए, जिससे चींटे - कीड़े रूपी हष्ट - पुष्ट काया वाले ,नोंच - नोंच कर जीवन को तार - तार करके पराश्रित बेल की तरह नरकीय बना दे .ईसलिए ईस अमानत को समाज की धरोहर समझकर सुरक्षा करनी चाहिए .

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