जीवन त्योहारों जैसा होता हैं

13 अगस्त 2016   |  बबिता गुप्ता   (182 बार पढ़ा जा चुका है)

मौसमों की तरह बदलते जीवन में आपदाओं विपदाओं का आवागमन होता रहता हैं .फिर भी हम जीवन को त्यौहारों ,उत्सवों,पर्वो की तरह जीते हैं .जीवन त्यौहारों जैसा हैं,जिसे हम हंसी ख़ुशी हर हाल में मनाते हैं .जीवन में होली के रंगों की तरह रंग - बिरंगी सुख दुःख के किस्से होते हैं -. कभी नीला रंग खुशियों की दवा देता हैं ,तो कभी लाल रंग से जीवन की सभी विपदाओं का आंचल साड़ी विपदाओं को पार कर देता हैं .पीले ,हरे ,गुलाबी रंगों की तरह दुनियां में कई खुशियाँ चेहरे को चमकाती ,दमकाती हैं .हसती खिलखिलाती दुनियां में असमी ही दुःख रूपी सावन की झड़ी लग जाती हैं ,लेकिन वो पुराने दुखो को विस्म्रत करने के साथ ही बदले में जीवन में हरियाली का दामन भी भर देती हैं .जिस तरह से हर दिन ,हर सुभ ,हर महीनें कुछ न कुछ तीज त्यौहार को मनाते हैं चाहे ईचाछा हो या न हो .ईसी तरह हम अपनी जिन्दगी में प्रति पल नई ख़ुशी,नई उम्मीद व् जोश के साथ स्वागत करे .परिवर्तन प्रक्रति का नियम हैं .आज दुःख हैं ,तो कल सुख  जरुर आयेगा.दुखों की नैया डूबते हुए बचाते जाते हैं और एक दिन खुशियों के पटाखें मन में फूटने लगते हैं .जिन्दगीं में खुशियों की सौगात दस्तक देती हैं .हम खुशियों के दीप प्रज्ज्वलित कर अपनी खुशुयों का ईजहार करते जाते हैं .सबके जीवन में रस भरी मिठाईयों से मीठी वाणी के रस घोलते हैं .खुशियों की चिंगारी चारो ओर फैलाते हैं .अन्धकार ,निराशा भरी जीवन में आशाओं का उजाला भर देते हैं .जहां दूर - दूर तक ढूडने पर भी दुःख दर्द दिखाई नही देता हैं .जब जीवन का प्याला खुशियों से भरा होता हैं तो हम किसी भी अनचाही घटनाओं की फरियाद नही करते हैं .ढोल - नगाडो का ऐसा जश्न मनाते हैं की दूर - दूर तक क्र्राहने की आवाज सुनाई नही देती हैं .आखों से अश्रुधारा सुखो की या दुखो की ,बेरोकटोक बहते जाते हैं .उसमे से सुखो के मोती बटोरकर नव वर्शागमन करते हैं .नूतन वर्ष के आगमन पर हम भरसक प्रयास करने पर हम दुखो को छिटक कर तहेदिल से नव नूतन अवसरों में खुशियों की उम्मीद से स्वागत करते हैं .जीवन भी सुख दुःख का मेला हैं ,ईसे उत्सवो की तरह मनाना चाहिए .प्रत्येक त्यौहार में अच्छाई - बुराई होती हैं .ऐसे ही प्रत्येक जीवन में .आपसी जीवन की तुलना से दुखी न होकर छोटी - छोटी चीजों में खुशियों को खोजना ही जिन्दगीं हैं .बड़ी ख़ुशी के चक्कर में छोटी खुशियाँ फिसलती जाती हैं .और हम भाग्य को कोसते रहते हैं .पकी फसल कटती हैं तो नई फसल उगाई जाती हैं .आपसी टकराव ,मतभेद ,नफरत को भुलाकर ईद के त्यौहार की तरह आपस में गले लगकर व् मीठी सिवई खिलाकर जीवन में रस घोलते हैं .हमारा जीवन सुख दुःख का डोला हैं ,जिसमे दुखो की झरी पतझड़ में झरने वाले पत्तों की तरह लग जाती हैं जो जोव्म को सुखाकर मात्र ढाचा बना देती हैं .तब भी हमे अडिग व्र्छ की तरह अपनी रिश्तों रूपी टहनियों को आंधी तूफान से बचाकर रक्षा करते हैं .समय की मार ईन्सान को झकझोर देती हैं उसका जीवन निराशा से भरे पत्र वहीं पेड़ की तरह हो जाता हैं .लेकिन एक दिन जीवन में सावन भादों की तरह सुखो की झड़ी लग जाती हैं बंजर जमीन हरीत्मा से भर जाती हैं चारो और खुशियों के फूल खिल खिलाने लगते हैं .श्राद्ध पक्ष में पूर्वजो का आशीर्वाद लेते हे .देवी क्रपा रहती हैं .

                     जीवन एक तराजू के दो पल्लों की तरह हैं जिसमें संतुलन सुख दुःख के दो पल्लों से हैं .जीवन के सुख में दीपावली के त्यौहार की तरह फटाखे फूटते हैं, तोहोली के त्यौहार की तरह हम नफरत को होली में दहन कर जीवन को रंग - बिरंगा बनाते हैं .त्यौहार की तरह जीवन को जिए .जीवन ही त्यौहार हैं . 

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