भजनी

14 अगस्त 2016   |  हर्ष वर्धन जोग   (168 बार पढ़ा जा चुका है)

भजनी

पहाड़ ी घुमावदार रास्ता हो और हरे भरे जंगल में से गाड़ी हिचकोले खाती जा रही हो तो बड़ा आनंद आता है. दिल चाहता है की गाड़ी चलती रहे और ऊपर और ऊपर. पर अगर इसी रास्ते से जाकर ऑफिस में हाजिरी लगानी हो तो? फिर तो ना हरियाली दिखती है और ना ही रास्ता पसंद आता है. फिर तो कमर दुखती है, सिर चकराता है और रीजनल मैनेजर के लिए यही दुआ निकलती है - ओ मोटे टकले बॉस तेरी पोस्टिंग भी कभी यहीं हो जाए.

जब यहाँ पोस्टिंग की थी तो बॉस बोला था कि बड़ी अच्छी ब्रांच दे रहा हूँ. सुंदर और ठंडी जगह है और काम भी कम है. दिल्ली की गर्मी से बचोगे. जाओ और ब्रांच का बिज़नेस बढ़ाओ. वहां एक लोकल अफसर है शर्मा, एक लोकल खजांची भी है. उनको दौड़ाते रहो फील्ड में. यंग हो अभी आगे लम्बा कैरियर है कुछ कर के दिखाओ. जो हुकुम मेरे आका कह कर हम तो आ बैठे बड़ी कुर्सी पर.

ब्रांच की लोकेशन सच में सुंदर थी. पहाड़ी की ढलान पर नीचे दो कमरों में ब्रांच और उसके ऊपर के दो कमरों में अपना राजमहल. वो बात और है की महारानी साथ नहीं होंगी. खिड़की से आस पास घने और हरे भरे पहाड़ी जंगल दिखाई देते थे . इस पहाड़ी इलाके में शाम को सूरज धीरे धीरे नहीं ढलता बल्कि अचानक ही गायब हो जाता है और अँधेरा एकदम छा जाता है. बारिश आती है तो बस ठंडी और मूसलाधार पर टीन की छत पर बहुत शोर करती है.

पहाड़ की इस ब्रांच में आ कर लगा कि शर्मा और खजांची की आपस में नहीं बनती और इन दोनों की भजनी से नहीं बनती. इसका कारण जातपात भी हो सकता है यह तो कभी ख़याल में नहीं आया. भजनी हमारी ब्रांच का चपड़ासी, डाकिया, चाय वाला याने हरफनमौला था. चाक चौबंद रहता था और काम टालता नहीं था. शर्मा और खजांची आपस में तो टांग खिचाई करते रहते थे पर शनिवार को मौसेरे भाई बन जाते थे. मतलब ये कि एक शनिवार को शर्मा और हर दूसरे शनिवार को खजांची अपने गाँव को फूट लेता और हाजिरी सोमवार को वापिस आकर लगा देता.

एक शनिवार शाम को शर्माजी ब्रांच में थे. घर की ओर निकलने लगे पर बाहर तेज़ बारिश शुरू हो गयी. रुकने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे थे और अँधेरा भी घिर आया था. इसलिए भजनी को खाने पीने का इंतज़ाम करने के लिए बोल दिया गया. उसने ऊपर वाला कमरा खोल कर बोतल और गिलास लगा दिए. छाता लेकर गया और बाहर से अंडे और नमकीन ले आया. किचन में अंडे फैंटने की आवाज़ आने लगी तो शर्मा जी तुरंत कर्कश आवाज़ में चीखे,
- भजनी ! तू छोड़ दे मैं बनाऊंगा.
मुझे कुछ आश्चर्य हुआ कि इतनी जोर से बोलने की आवश्यकता तो नहीं थी. पर भजनी तुरंत बर्तन छोड़ कर दरवाज़े के पास फर्श पर चुपचाप बैठ गया. खाने पीने का प्रोग्राम शुरू हो गया तो एक गिलास और प्लेट भजनी को भी दे दिया गया. शर्मा जी ने आदेश दिया की दो अंडे और ले आ. भजनी फिर से छाता लेकर नीचे चला गया. शर्मा जी बोले,
- अरे साब इस भजनी से किचन का काम मत करवाया करो आप.
- क्यूँ? साफ़ सुथरा तो रहता है क्या हुआ?
- अरे साब साफ़ सुथरे की बात नहीं है वो तो डोम है डोम.
- डोम?
- अरे साब ये जो डोम होते हैं उन्हें तो घर के नज़दीक भी नहीं आने देते आप तो उसे किचन के अंदर घुसा रहे हैं. ऐसे नहीं होता. आप तो दिल्ली से आये हो और अगले साल वापिस चले जाओगे. इन लोगों से तो हमें ही डील करना है. हम अपना समाज थोड़े ही खराब कर लेंगे. जैसे पहले चलता रहा है वैसे ही तो चलेगा.

शर्मा जी ने तुरंत गिलास ख़तम किया और वाक आउट कर गए. भजनी को शायद अंडे मिले नहीं या शायद शर्मा के विकराल रूप से भयभीत हो गया, वो तो वापिस ही नहीं आया. रात को भजनी, शर्मा और अपने बर्तन खुद ही धो दिए. 

 Sketches from Life: भजनी

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