जिन्दगी एक जुआ हैं

15 अगस्त 2016   |  बबिता गुप्ता   (215 बार पढ़ा जा चुका है)

जिन्दगी एक जुआ की तरह हैं ,जिसमे ताश के पत्तों की तरह जीवन की खुशियाँ बखर जाती हैं .जब तक जीवन में सुखों का अंबार लगा रहता हैं तब तक हमें उन लम्हों अ आभास ही नहीं होता हैं जो हमारी हंसती ,मुस्कराती ,रंग - बिरंगी दुनियां में घुसपैठ कर बैठती हैं और जीवन की खुशनुमा लम्हों की लड़ीबिखर कर ,छितर कर गम हो जाती हैं .जैसे जान में ईन्सान जब तक जीतता रहता हैं तब तक उसे जिन्दगी का एक अरसा गुजर जाने का पता भी नहीं चलता .लेकिन जब हार का आभास होनें पर भी वह आखिरी समय तक दाव लगाना नहीं छोड़ता ,जब तक उसका सब कुछ न लुट जाए .ईसी तरह हम जीवन में दुखों को आखिरी श्वांस लेने तक ,जूझते हुए आखिरी में दम  तोड़ देते हैं .हम अपने जीवन के प्रति दुखों के आते ही हम अपने जीवन को दांव पर लगाते रहते हैं और बिना सोचे ,परवाह किए बगैर हम दुखों के अन्धकार में धसने लगते हैं .और हम जुआरी की तरह नजरियाँ बना लेते हैं .

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