दो पत्ती का श्रमनाद !

16 अगस्त 2016   |  स्पर्श   (138 बार पढ़ा जा चुका है)


 

पसीने से अमोल मोती देखे हैं कहीं ?
कल देखा उन मोतियों को मैंने
बेज़ार ढुलकते लुढ़कते
मुन्नार की चाय की चुस्कियों का स्वाद
और इन नमकीन जज़्बातों का स्वाद
क्या कहा ....बकवास करती हूँ मैं !
कोई तुलना है इनकी !

 

सड़कों पर अपने इन मोतियों की कीमत
मेहनतकशी की इज़्ज़त ही तो मांगी है इन्होंने
सखियों की गोद में एक झपकी लेती
ये महिला साक्षी है कि
ज़िंदा कौमें ज़्यादा देर तक चुप नही बैठा करतीं
ये भी कि ..
औरत ,गरीबी और
बिलकुल निचले पायदान पर खड़ी इस कौम के
जिस रूप से तुम वाकिफ़ नही थे
आज वो मांग रही है जो उसका हक़ है
उसकी आजीविका की गाड़ी
चलती जिससे
उसे क्या मतलब डिजिटल इंडिया से
उसकी लड़ाई सोशल मीडिया पर थोड़ी न ट्रेंड करेगी
वो तो खुद को जोड़ रही है
अपनी ही सी भुक्तभोगी साथियों से

 

चाहे आसमान से कहर गिरे
सूरज की मार आ पड़े
जिसकी ज़िन्दगी में बारिशों का
पक्का अड्डा हो ,वो
क्या सड़कों पर इस संघर्ष की
और बादलों वाली बारिशों के बीच
भीगने से डरेंगी ?

 

क्या छातों तले हक़ के इरादों को छुपाया जा सकेगा
क्या चुप्पियों के विरोधी स्वर होंगे बुलंद
क्या हम कर पाएंगे
कल ही याद किये गए गांधी को
असली श्रद्धांजलि समर्पित
कि श्रम के हर रूप का सम्मान
और चुका पाएंगे उनके पसीने का मोल
जिसने महकाया है जीवन को
मेरे और तुम्हारे
अपने हाथ की खुशबुओं से
बोलो या कुचल दोगे इन औरतों को
इनके खामोश अरमानों को
कि संविधान की  सालगिरह
का जश्न आने को है ,साहब !

 

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स्पर्श
20 फरवरी 2017

धन्यवाद . :)

रेणु
20 फरवरी 2017

बहुत अच्छी कविता

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