तुझे अल्फाज के मानिंद जब-जब गुनगुनाया है

17 अगस्त 2016   |  अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'   (251 बार पढ़ा जा चुका है)


तुझे अल्फाज के मानिंद जब-जब गुनगुनाया है, शफ़क़ इकवारगी फिर ज़िन्दगी में लौट आया है। उदासी देर तक ठहरी रही मेरी निगाहों में, मुक़द्दर मानकर मैंने अभी तक तो निभाया है। तराशा भी गया हूँ और तमाशा भी बना हूँ मैं, कसौटी पर रखा हमको समय ने आजमाया है। शराफत रास ना आयी मुहब्बत ने दी रुसबाई, उम्मीदों ने इरादों को अंधेरों में जगाया है । कई मर्तबा मुझमें मेरी परछाइयाँ गुम हो गईं, मेरे सपनो को अक्सर ही सलीबो पर चढ़ाया है। लहर में बह गया साहिल समंदर और सफ़ीना भी, बह्शीयत का कोई तूफां है जो मुझमें समाया है। वो मंज़र बेवफाई के उभर आये हैं आँखों में, दिया था मुस्कुराने का हमें वादा रुलाया है। नहीं समझा सका दिल को बनावट का चलन यारो, मगर घर के चिरागों ने हमारा घर जलाया है। अगर 'अनुराग' तुम क़ासिद न होते तो मसीहाई , बहुत बदनाम होती ज़िन्दगी अपना पराया है।

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फ़कीर मोहम्मद फालना, 9414191786
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अनुराग भाई राहत इन्दोरी का एक मतला है
" हर एक हर्फ़ का अंदाज़ बदल रखा हैं
आज से हमने तेरा नाम ग़ज़ल रखा हैं "
अपने जिसे भी सोचकर लिखा है वाकई में उसे गजल बना के खुद अल्फ़ाज़ बन गए
बहुत सुन्दर गजल है

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