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जब पहाड़ पर नागा बाबा से मिली अकेली घुमंतू लड़की

22 अगस्त 2016   |  प्रतीक सिंह

जब पहाड़ पर नागा बाबा से मिली अकेली घुमंतू लड़की

गांव चमारी में घर की ढलान से उतरते ही महादेव कक्का का घर था. उनके घर में खूब सारी छिरिया (बकरी) थीं. कक्का की एक बेटी थीं. लक्ष्मी दीदी. उनकी शादी हो चुकी थी. पर वह कक्का की अकेली औलाद थीं. तो यहीं रहती थीं. मैं मम्मी से छुटपन में कह देते. कक्का की तो छिरिया भी रोज घूमने जाती हैं लैन (रेलवे लाइन) तक. मगर दीदी नहीं जातीं.

फिर गांव छूट गया. पता चला कि दीदी का भी गांव छूट गया. वह चली गईं. मायके से.

मायके सबके छूट जाते हैं. मेरा भी छूट गया. यहां नोएडा में हूं. क्या ये भी किसी का मायका होगा.

खैर. अब जो भी है देह यहीं है. दिल करता है. सब खूंटे उखाड़ मय रस्सी दौड़ लगा जाऊं. इतनी तेज कि कोई केसना दद्दा पकड़कर कांजी हाउस में बंद न कर सके.

कुछ लोगों ने खूंटे खोल लिए हैं. चलते जाते हैं. चरते जाते हैं. बढ़ते जाते हैं. गोया मेरे महा पुरखों की लिखी ऋचा को उन्होंने ही पूरा का पूरा सुना और समझा हो.

चरैवेति-चरैवेति. चलते रहो. चलते रहो.

ये जो लोग हैं. ये हमारी रात के जुगनू हैं. जो सब दीये बुझने के बाद भी रौशनी को पेट पेट छुपाए सुबह तक पहुंचा देते हैं.

बीते रोज ऐसी ही एक जुगनू मायावी दुनिया से असल में सामने आ गई. गहरे प्याजी रंग के लिबास में. लक्ष्मी नाम है उसका.

लक्ष्मी के पांव नहीं टिकते. खूब घूमती है. और अकेले नहीं. सब लक्ष्मियों को संग साथ लिए.

इस दौरान जिन पड़ावों पर ठहरती है. जिन निगाहों को पढ़ती है. उनकी खबर भी रखती है.

हमने कहा. अपनी नजर से हमें भी घुमाओ. वो मुस्कुरा दी. जैसे भुंसारे (दिन का पहला पहर) तालाब से एक साथ दर्जनों सुफैद पक्षी एक कतार में उठे हों. आसमां की तरफ. चमकती लकीर से.

ये हां की एक तस्वीर थी.

और अब सिलसिला शुरू होने को है. दी लल्लनटॉप पर इससे पहले आप अनुराधा सिंह नाम की महिला से मिल चुके हैं. बनारस की रहने वाली. जो अपने डॉक्टर पति की खींची तस्वीरों की कहानी सुनाती रहती हैं. (पति पत्नी और वो कैमरा सीरीज)

और अब लक्ष्मी कंवर चूड़ावत की बारी है. इन सब लड़कियों को हमारा लाख लाख सलाम. हमारी मांएं. बहनें. प्रेमिकाएं. सहेलियां. बेटियां. सब यूं ही दर दर भटकें. अपने हिस्से की चाबियां खोजें. ताले खोलें. किवाड़ों को धकेलें. और चलती जाएं.

यूं लक्ष्मी का परिचय ऐसे भी दिया जा सकता है. 25-26 बरस की लड़की. बांसवाड़ा की पैदाइश. वड़ोदरा में पली बढ़ी. पिता फौजी. मां ने घर और बेटी को बनाया. एक लंबे चौड़े कोर्स (ह्यूमन डिवेलपमेंट एंड फैमिली स्टडीज) में मास्टर्स की डिग्री. महाराजा सय्याजी राव यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा से. पत्रकार रहीं. फिर टीचर बन गईं. और आखिर में तै किया कि घुम्मी ही करनी है. travel my ladies के नाम से दोस्तों संग कंपनी चलाती हैं. जिसके तहत सिर्फ महिलाओं और लड़कियों को ही घुमाने ले जाती हैं.

भटकने के दौरान जो तस्वीरें और किस्से बटोर लाती हैं, उन्हें जब तब travellerbaisa.com पर दर्ज करती जाती हैं.

अब उनका एक पता ये भी है. आपकी वेबसाइट. thelallantop.com
– सौरभ द्विवेदी


जब भी कहीं घूमने निकलती हूं. तो वहां के बारे में ज्यादा नहीं पढ़ती. दूसरों का नजरिया दिमाग में चढ़ जाता है. मैं अपना अलग मानचित्र बनाती हूं. मुझे ऐसा लगता है कि हर किसी का अपना अनुभव होता है और वो हमेशा अलग होता है. तो किसी और के अनुभव की चादर अपनी आंखों पर नहीं डालती.

बराबर याद नहीं है पर शायद जब मैं आठवीं में थी, तब पहली बार स्कूल की तरफ से खेल ने के लिए अकेले गई थी. उसके बाद हर साल जाती. अकेले एक जगह से दूसरी जगह जाने का डर तब ही खत्म हो गया था. कॉलेज के दिनों में भी हॉस्टल में रही तो हौसला और बढ़ गया.

पहाड़ों से मुझे बहुत लगाव है. चाहे वो सुफैद हों या भूरे. पर सुफैद की तरफ मन ज्यादा दौड़ता है. क्योंकि उनको कम देख पाती हूं. इसलिए पिछले कुछ सालों से लगातार इनसे मिलने हिमालय की तरफ आ रही हूं. और लगाव है कि बढ़ता ही जा रहा है.

यहां कहीं कहीं रस्ते बहुत संकरे हैं. और डेवलपमेंट इतना है कि हर जगह काम चल रहा है. वशिष्ठ की तरफ जो रास्ता जाता है, वहां ये ट्रक खड़ा था तो जगह कम पड़ गई.

इस बार शुरुआत मनाली से की. बड़ौदा से दिल्ली और दिल्ली से मनाली. जिन जगहों पर मैं जा चुकी होती हूं उनके लिए रात की बस या ट्रेन पकड़ती हूं ताकि दिन में और दूसरी जगह देख सकुं. और जिन जगहों पर पहली बार जा रही होती हूं वहां के लिए दिन का सफ़र करती हूं. ताकि उनके रास्ते, लोग और बातों को थोड़ा करीब से देखूं और सुनूं.

तो मनाली पहले भी आई थी इसलिए रात की बस पकड़ी और सुबह पहुंच गई. इस बार मनाली को थोड़ा अंदर से देखने की इच्छा थी.

गरम पानी के सोते में नहातीं औरतें

मैं गरम देश से आई लड़की. मोटी जैकेट से ठंड तो बच रही थी. मगर साथ में आलस भी. वो भी ऐसा कि मेरे देवता भी न नहाएं. मगर पता था कि वशिष्ठ में जमीन से गरम पानी निकलता है. तो रोज वहां नहाने चली जाती. इस दौरान लोकल औरतों से खूब मुलाकात होती. उनसे बात करती तो शुरुआत यकीन की कमी से होती. वो ये मान ही नहीं पातीं कि मैं बिना किसी नाते रिश्तेदार यार दोस्त के चली आई हूं. जब मान जातीं तो अपनी बातें बतातीं. पर ये वक्त भी जल्दी बीत जाता.


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