कुछ आस नही लाते

22 अगस्त 2016   |  शिवदत्त   (99 बार पढ़ा जा चुका है)

हर मोड़ पर मिलते है यहाँ चाँद से चेहरे

पहले की तरह क्यो दिल को नही भाते ||

बड़ी मुद्दतो बाद लौटे हो वतन तुम आज
पर अपनो के लिए कुछ आस नही लाते ||

काटो मे खेल कर जिनका जीवन गुज़रा
फूलो के बिस्तर उन्हे अब रास नही आते||

किसान, चातक, प्यासो आसमा देखना छोड़ो
बादल भी आजकल कुछ खास नही आते ||

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