कविता

22 अगस्त 2016   |  समीर कुमार शुक्ल   (89 बार पढ़ा जा चुका है)

तुम शाश्वत में प्रतिपल में

तुम आज में कल में


तुम पवन में जल में

तुम भस्म में अनल में


तुम रहस्य में हल में

तुम मौन में कोलाहल में


तुम कर्कश में कोमल में

तुम मलिन में निर्मल में


तब क्या तुमको पाना

तब क्या तुमको खोना

समीर कुमार शुक्ल

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