इन्सान

23 अगस्त 2016   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (121 बार पढ़ा जा चुका है)

@@@@@@ इन्सान @@@@@@

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सृष्टि का सबसे विचित्र , प्राणी है इन्सान |

जीता है वो जिन्दगी,दिखा कर झूठी शान ||

नहीं जी पाता वो कभी,सीधी सहज जिन्दगी |
झूठ और कपट की ,करता उम्र भर बन्दगी ||
बड़ा होना चाहता बचपन में, पचपन में चाहता फिर बचपन |
अजीब है इन्सान की फितरत,जिन्दगी भर करता हाय धन ||
सेहत की कीमत पर भी , वो संचय करता अकूत धन |
फिर सहत पाने की खातिर ,खर्च करता फिर वही धन ||
भविष्य की चिंता करते,वो गँवा देता वर्तमान को |
अपनी दुर्दशा के लिए , वो दोष देता शैतान को ||
जीता है वो ऐसे जैसे , नहीं मरेगा वो कभी |
मरता है तो यूँ लगता है,नहीं जिया वो कभी ||
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