लुटेरे -लुटेरे भाई -भाई

23 अगस्त 2016   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (89 बार पढ़ा जा चुका है)

पाखण्ड पर कटाक्ष करती कहानी - लुटेरे -लुटेरे भाई -भाई ************************************************************ एक शहर की सीमा पर स्थित एक मंदिर के विशाल प्रांगणमें एक पंडा पंडाल में बैठे जन -समूह को प्रवचन देते हुए यह बता रहा था कि ईश्वर सर्वशक्तिमानहै |ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ भी नहीं होता |यानी सृष्टि या संसार में जो कुछ होता है ,ईश्वर की इच्छा से होता है |यह सुनकर उस पण्डे के पड़ौस में रहने वाला एक बारह वर्षीय बालक खड़ा होकर पूछने लगा ,"फिर तो आपके पिताजी की हत्या भी खड़ग सिंह ने ईश्वर की इच्छा से ही की होगी |फिर आपने उसे ह्त्या के जुर्म में जेल क्यों भिजवाया ?"पंडा बोला ,"अभी तुम बच्चे हो ,इस बात को तुम अभी नहीं समझोगे |"यह कह कर पण्डे ने बालक को तो चुप कर दिया , पर एक युवक बोल पड़ा ,"फिर तो पिछले वर्ष इस मंदिर में चोरी भी ईश्वर की इच्छा से ही हुई होगी|फिर आपने चोर झुंझार सिंह को मंदिर में चोरी के अपराध में सजा क्यों दिलवायी ?"इस पर पंडा बोला ,"ईश्वर को चोर की रोजी -रोटी का ख्याल भी करना होता है |इसलिए ईश्वर ने झुंझार सिंह को चोरी का मौका दिया और मैंने अपना कर्तव्य निभाते हुए उसको सजा दिलवायी |"पण्डे के गोलमोल उतर सुनकर एक प्रौढ़ ने पण्डे पर प्रश्नों की झड़ी लगा दी |वह पण्डे से यह पूछ बैठा ,"फिर तो आपकी बेटी के बलात्कार का मौका भी ईश्वर ने बलात्कारी जालम सिंह की हैवानियत का ख्याल करके ही अपने इस मंदिर में दिया होगा | फिर आपने जालम सिंह को किस आधार पर अपराधी मान कर कारावास की कठोर सजा दिलवायी ?उसने तो आपकी बेटी का बलात्कार ईश्वर की ईच्छा से ही तो किया था |वह तो ईश्वर के हाथ की कठपुतली था |उसे तो वह सब करना ही था ,जो सर्वशक्तिमान ,सर्वव्यापी और अन्तर्यामी ईश्वर ने उससे करवाया |जब सर्वशक्तिमान ईश्वर सब कुछ कर सकता है ,तो वह इन्सानों के दिल -दिमाग निर्मल क्यों नहीं रखता ?क्यों वह किसी के दिमाग में दुर्भावना भर कर उसे दुशासन बनाता है ,फिर उससे द्रोपदी का चीर हरण करवाने का प्रपंच रचता है |क्या इसलिए की बेबस द्रोपदी अपनी लाज बचाने के लिए उसे पुकारे तो वह लाज रक्षक की भूमिका निभाकर लोगों का पूजनीय बना रह सके |अरे जिस कृष्ण ने खुद नदी में नहाती गोपियों के चीर चुरा कर पेड़ पर बैठे -बैठे गोपियों की बेबसी और नग्नता का आनंद लिया हो ,उसे भला द्रोपदी की लाज की परवाह कैसे हो सकती थी ?यदि होती तो वाह सर्वशक्तिमान होने के नाते दुशासन के दिल में द्रोपदी के चीर हरण की ईच्छा ही क्यों पैदा करता ?जब मासूम बच्चियों से बलात्कार जैसे जघन्य जुर्म ईश्वर की ईच्छा से होते हैं,तो ऐसा ईश्वर पूजनीय कैसे हो सकता है ?अपने बारूद के कारखाने में धूम्र -पान की छूट देकर अग्नि कांड का इन्तजाम करने वाला मालिक,आग लगने पर आग बुझाने का प्रपंच करके सम्मानीय कैसे हो सकता है ? प्रौढ़ के उक्त प्रश्नों का कोई उचित उतर नहीं सूझने पर पण्डे ने उसे टालने के लिए यह कह दिया कि ईश्वर की माया ईश्वर ही जाने |बालक,युवक व प्रौढ़ के सटीक प्रश्नों तथा पण्डे के गोलमोल उतरों को सुनकर श्रोताओं में हलचल मच गयी |यह देख कर पण्डे ने यह कह कर सभा विसर्जित कर दी कि प्रवचन का समय समाप्त हो गया है | जनता के जाने के बाद दान -दक्षिणा में मिला माल ले कर जैसे ही वह रवाना हुआ ,एक लुटेरा जो मौके की ताक में छिप कर पण्डे के प्रवचन की समाप्ति का इन्तजार कर रहा था ,फुर्ती से पण्डे के पीछें से आया और उसने उसे अपने मजबूत बाहुपाश में जकड़ने के बाद अपने दांये हाथ में पकड़े रामपुरी चाकू की धार उसके गले पर लगाते हुए बोला ,"अगर अपनी जान प्यारी है तो सारा माल मेरे हवाले कर दो ,वर्ना जान भी जायेगी और माल भी |"मौत की धमकी से पंडा घबरा कर बोला ,"अरे तू ऐसा मत करना ,नहीं तो तुम्हें मेरी ह्त्या का पाप लगेगा और तू नरक में जायेगा |"लुटेरा बोला ,"तेरी ह्त्या का पाप मुझे क्यों लगेगा ?"पंडा बोला ,"जब मेरी ह्त्या तू करेगा तो पाप भी तेरे को ही लगेगा |" तब लुटेरा बोला ,"अरे पण्डे तू अभी थोड़ी देर पहले लोगों को यह बता रहा था कि ईश्वर की ईछा के बिना कुछ भी नहीं होता |सृष्टि में जो कुछ होता है ,ईश्वर की ईच्छा से होता है |तेरी ह्त्या भी ईश्वर की ईच्छा से होगी |फिर तेरी ह्त्या का पाप मुझे क्यों लगेगा ? मैं तो ईश्वर की ईच्छा का पालन भर करूंगा |" मौत सामने देख कर पंडा सच बोलने को मजबूर हो कर लुटेरे से कहने लगा ,"थोड़ी देर पहले मैं जो कुछ लोगों को बता रहा था ,वह तो ईश्वर के नाम पर खोली गयी हमारी धर्म ,भ्रम व ठगी की सांझी दुकान चलाने के लिए जरूरी है |इसी के बूते हम बिना जोर -जबरदस्ती के ,बड़ी सहजता से धर्मांध जनता को दोनों हाथों से लूटते हैं |और जनता हमसे लुट कर भी हमारा सम्मान करती है |क्योंकि उसको यह भरोसा है कि हम ईश्वर के प्रतिनिधि हैं और हम दान-दक्षिणा के बदले स्वर्ग में उसकी जगह पक्की कर देंगें |दरअसल हमारा और तुम्हारा धंधा एक ही है -लूटना |हाँ इस लूट के धंधे का तरीका हम दोनों का बिल्कुल अलग है |"पण्डे की बात सुन कर लुटेरा खुश होते हुए बोला ,"तुम सच कहते हो पण्डे भैया|मैं जनता को जबरदस्ती लूटता हूँ और तुम सहमति से |मैं लूटने के लिए बल का प्रयोग करता हूँ और तुम बुध्दि का |जब हम दोनों का धंधा एक है ,तो चोर -चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर हम लुटेरे -लुटेरे भाई -भाई हुए और दो भाइयों में झगड़ा अच्छी बात नहीं |पण्डे भैया,लूट का आधा माल तुम रखो और आधा मुझे दे दो |"पण्डे ने सहर्ष आधा माल अपने लुटेरे भाई को दे दिया और दोनों अपना -अपना हिस्सा लेकर अपने ठिकाने चल दियें |

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धन्यवाद, हर्ष जी

बढ़िया कटाक्ष

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