BJP का फाउंडिंग मेंबर एक मुसलमान था!

23 अगस्त 2016   |  प्रतीक सिंह   (526 बार पढ़ा जा चुका है)

BJP का फाउंडिंग मेंबर एक मुसलमान था!

जैसे उर्दू शायरी के मंच पर बैठा हिंदी का कवि!
वैसे BJP में शाहनवाज़ हुसैन और मुख़्तार अब्बास नकवी!

एक छुटभैये नेता के इस जुमले को यहां पेश करने के लिए माफ करें. लेकिन उसके सवाल की अनदेखी मुश्किल है. पान मसाले की झौंक में उसने कहा था कि BJP में मुसलमान होना अकेलापन नहीं पैदा करता होगा?

शाहनवाज, नकवी, नजमा हेपतुल्लाह, एमजे अकबर. बीजेपी के मुस्लिम चेहरे. लेकिन क्या आप जानते हैं कि बीजेपी का पहला बड़ा मुस्लिम चेहरा कौन था?

ये थे चमकीले बालों वाले ‘पद्म भूषण’ सिकंदर बख़्त, जो एक समय कांग्रेस में थे. बख्त हफ्ते भर के लिए भारत के विदेश मंत्री भी रहे. ये पहले राज्यपाल थे, जिनकी पद पर रहने के दौरान मौत हो गई. ये वो मुस्लिम नेता थे, जिन्हें बीजेपी अपना फाउंडिंग मेंबर कहती थी.

सिकंदर बख्त का 23 अगस्त को जन्मदिन होता है.

आज कहानी सिकंदर बख्त की

सिकंदर बख्त 1918 में एक तंबाकू विक्रेता के यहां पैदा हुए थे. दिल्ली के एंग्लो-अरेबिक कॉलेज (अब जाकिर हुसैन कॉलेज) से पढ़ाई हुई. स्कूली दिनों में हॉकी खेल ते थे. शुरू में लाइफ बहुत सिंपल थी. 1945 तक वो भारत सरकार के सप्लाई डिपार्टमेंट में क्लर्क थे.

1952 में सिकंदर बख्त कांग्रेस से एमसीडी चुनाव जीत गए. 1968 में वो दिल्ली इलेक्ट्रिक सप्लाई अंडरटेकिंग के चेयरमैन चुने गए. 1969 में जब कांग्रेस में दो-फाड़ हुई तो सिकंदर बख्त इंदिरा गांधी के साथ न जाकर कांग्रेस (ओ) के साथ बने रहे. इस तरह उन्होंने इंदिरा के विश्वासपात्रों की दुश्मनी मोल ले ली. 25 जून 1975 को जब देश में इमरजेंसी घोषित हुई तो सिकंदर बख्त भी जेल में डाल दिए गए. दिसंबर 1976 तक वो रोहतक जेल में रहे. इमरजेंसी खत्म हुई तो जेल से निकले नेताओं ने इंदिरा के खिलाफ जनता पार्टी बना ली. सिकंदर बख्त अब जनता पार्टी के नेता हो चुके थे.

1977 में वो जनता पार्टी के टिकट से चांदनी चौक से लोकसभा चुनाव लड़े और जीत गए. मोरारजी देसाई सरकार बनी और सिकंदर बख्त कैबिनेट मिनिस्टर बनाए गए. 1879 तक वो मंत्री रहे.

अटल से यारी ले आई बीजेपी में

इमरजेंसी के दौर में सिकंदर बख्त की अटल बिहारी वाजपेयी से अच्छी दोस्ती हो गई थी. 1980 में जब जनता पार्टी से टूटकर बीजेपी बनी तो वो सिकंदर बख्त भी उसमें शामिल हो गए और सीधे पार्टी महासचिव बना दिए गए. 1984 में उन्हें उपाध्यक्ष बना दिया गया. बीजेपी के शुरुआती दौर में वो इकलौते बड़े मुस्लिम नेता थे.

साल 1990 में वो मध्य प्रदेश से राज्यसभा में चुने गए. सन् 92 में वो राज्यसभा में नेता विपक्ष चुने गए. 1996 में वो फिर राज्य सभा के रास्ते संसद पहुंचे.

बीजेपी को पहली बार केंद्र की सत्ता का स्वाद मिला 1996 में. NDA सरकार बनी तो अटल बिहारी वाजपेयी ने सिकंदर बख्त को शहरी मामलों का मंत्री पद ऑफर किया. लेकिन बख्त इससे खुश नहीं थे. इस दौरान पत्रकार राजदीप सरदेसाई उनका इंटरव्यू करने गए तो गुस्से में बख्त ने कहा, ‘मुझे पता है तुम पूछोगे कि क्या मेरे मुसलमान होने की वजह से मेरी वरिष्ठता को सम्मान नहीं मिला?’

हफ्ते भर बाद, यानी 24 मई को उन्हें विदेश मंत्रालय का अतिरिक्त कार्यभार दिया गया. लेकिन उनका दुर्भाग्य कि अटल सरकार 13 दिन ही चल पाई. बख्त एक ही हफ्ते विदेश मंत्री रह पाए. सरकार गिरने के बाद उन्होंने दोबारा राज्यसभा में नेता विपक्ष की कुर्सी संभाल ली.

अटल दौर में आडवाणी के खिलाफ मोर्चा खोला

1997 में अटल बीजेपी के सबसे बड़े नेता थे, पर अध्यक्ष की कुर्सी आडवाणी के पास थी. उस दौर में सिकंदर बख्त ने खुलकर माना कि पार्टी अध्यक्ष के नियमों को लेकर उनके आडवाणी से मतभेद हैं. बख्त का मानना था कि किसी को भी पार्टी अध्यक्ष के बतौर दूसरा कार्यकाल नहीं मिलना चाहिए. उन्होंने वरिष्ठ नेता सुंदर सिंह भंडारी को अध्यक्ष बनाने की मांग की. संकेतों में ये भी माना कि वो भी अध्यक्ष पद में दिलचस्पी रखते हैं, लेकिन अंतत: सीनियर नेताओं को ही उनका नाम आगे करना होगा.

बख्त चाहते थे कि पार्टी अध्यक्ष का कार्यकाल 5 साल का होना चाहिए, लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई और इसे दो साल का बनाए रखा गया. हालांकि पार्टी संविधान में ये इंतजाम जोड़ दिया कि जरूरत पड़ने पर कार्यकाल बढ़ाया भी जा सके.

‘मुसलमान क्यों नहीं गाते वंदे मातरम्, इसमें क्या गुनाह है?’

1997 में बख्त ‘वंदे मातरम’ न गाने को लेकर मुस्लिम समाज पर भड़क गए थे. भाजयुमो का नेशनल मुस्लिम यूथ सम्मेलन था. लेकिन बीजेपी की परंपरा के उलट इस सम्मेलन में राष्ट्रगीत नहीं गाया गया. बख्त इसके लिए मुस्लिम समाज पर काफी नाराज हुए और यहां तक कह गए कि वह शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि वंदे मातरम अपनी मातृभूमि को सलाम करना है. हमें इसमें शर्म क्यों आती है?

बाद में उमा भारती ने बताया, भाजयुमो प्रेसिडेंट होने के नाते उन्होंने ये गाना नहीं करवाया था, क्योंकि कोई उसकी तैयारी करके नहीं आया था. लेकिन दुर्भाग्य से बख्त जी को इससे गलत संदेश गया.

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