अपने हुनर को तराश इतना

26 अगस्त 2016   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (156 बार पढ़ा जा चुका है)

@@@@ अपने हुनर को तराश इतना @@@@

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अपने हुनर को तराश इतना ,कि तू

दुनिया का सरताज हो जाये |

हर ताज रहे तेरी ठोकर में ,और तू बादशाह बेताज
हो जाये||
अपने इल्म को निखार इतना, कि हर नजर दीदार
को बेताब हो जाये |
छू ले तू हर बुलन्दी को , और सच्चे तेरे ख्वाब
हो जाये ||
दिखा तू करतब अपना ऐसा , कि तुझे तुझ पर नाज
हो जाये |
और हर ईनाम तेरी झोली में , आने को बेताब
हो जाये ||
फैला तू ज्ञान का प्रकाश इतना ,कि तू विश्व गुरू
नायब हो जाये |
पछाड़ कर हर पाखण्ड को , तू एक खुली किताब
हो जाये ||
संवार तू अपनी हस्ती इतनी ,कि तू
दुनिया की आवाज हो जाये |
और तेरे नाम से भी किसी , पुरस्कार का आगाज
हो जाये ||
कर तू चमत्कार ऐसा, कि तेरी हर कोशिश कामयाब
हो जाये |
और तेरी हस्ती के सामने , छोटा हर खिताब
हो जाये ||
कर तू सृजन अनुपम ऐसा ,कि तेरी रचना अमर
सौगात हो जाये |
और तेरे सुकर्मो से जग में,खुशियों की बरसात
हो जाये ||
कर तू जीत का इन्तजाम ऐसा ,कि हर दुश्मन
की मात हो जाये |
यह चुनौती है दुर्गेश तुझे, आज से ही जंग
की शुरुआत हो जाय ||

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