इंसानियत का झंडा कब से यहाँ खड़ा है ...

27 अगस्त 2016   |  दिगम्बर नासवा   (98 बार पढ़ा जा चुका है)

इंसानियत का झंडा कब से यहाँ खड़ा है ...

बीठें पड़ी हुई हैं, बदरंग हो चुका है

इंसानियत का झंडा, कब से यहाँ खड़ा है



सपने वो ले गए हैं, साँसें भी खींच लेंगे
इस भीड़ में नपुंसक, लोगों का काफिला है


सींचा तुझे लहू से, तू मुझपे हाथ डाले
रखने की पेट में क्या, इतनी बड़ी सजा है


वो काट लें सरों को, मैं चुप रहूँ हमेशा
सन्देश क्या अमन का, मेरे लिए बना है


क्यों खौलता नहीं है, ये खून बाजुओं में
क्या शहर की जवानी, पानी का बुलबुला है


बारूद कर दे इसको, या मुक्त कर दे इससे
ये कैदे बामशक्कत, जो तूने की अता है

(तरही गज़ल ...)


स्वप्न मेरे ...

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बहुत खूब

रश्मि प्रभा
28 अगस्त 2016

बहुत ही बढ़िया

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