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बॉलीवुड मूवीज और मनोवैज्ञानिक समस्याएं

31 अगस्त 2016   |  मांडवी

priyanka chopra

बॉलीवुड विश्व की सब बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है, और ये एक ऐसा स्तर हैं, जो हमारे समाज और उनके लोगों को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है।
हर शनि और रविवार को मल्टीप्लेक्स की टिकट विक्रय इसका प्रमाण है।
हमारी युवा पीढ़ी बॉलीवुड के सितारों से प्रभावित है, यहाँ तक की बुज़ुर्ग और बच्चे भी। बड़ी संख्या में दर्शकों तक पहुँचने का जरिया है ये बॉलीवुड ।
उनपर गंभीर जिम्मेदारी बनती है कि वह फिल्मों में क्या दिखा रहें है, इससे समाज में अच्छे और बुरे दोनों प्रभाव पड़ते हैं ।
खुश किस्मती, से आजकल, फिल्मों में काफी परिवर्तन आ रहा है। घर घर की कहानी से हट कर निर्माता समाज के गंभीर मुद्दों पर फिल्म बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे हम रीयलिस्टिक सिनेमा कहते हैं। और इन्हीं में एक मुद्दा है, मानसिक प्रतिबंध।
समाज में, मानसिक रोगियों को लेकर जो कलंक या हीन भावना है, उसके विरुद्ध लड़ने में बॉलीवुड हमारी मदद करता है।
बर्फी, तारे ज़मीन पर, ब्लैक, गुज़ारिश, और मार्गरिटा विथ अ स्ट्रॉ जैसी फिल्मों में मानसिक रोग को एक ख़ुशी, एक क्षमता की तरह दिखाया गया है।
बर्फी में एक गूंगे और बहरे इंसान को हम खुशहाली से ज़िन्दगी बिताते देखते हैं, हँसते मुस्कुराते देखते हैं, तो हमें लगता ही नहीं की ये कोई दुर्बलता हो सकती है। दूसरी तरफ उसी फिल्म में झिलमिल जो की एक ऑटिस्टिक लड़की हैं, प्यार और रिश्तों की परिभाषा बताती है। और जब ये चरित्र हमारे पसंदीदा कलाकार रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा निभा रहे हैं, तो हमें ये मानसिक बीमारी कलंकित नहीं लगता। उनका मज़ाक बनाने के बजाए, उनसे जुड़ जाते हैं, और हमदर्दी से हम फिल्म को और अभिनेताओं को सराहते हैं।
पर अच्छी बात यह है, की मानसिक रोग के प्रति हमारा नजरिया बदलता है।


guzaarish

गुज़ारिश में ह्रितिक रोशन एक अद्भुत जादूगर की भूमिका में नज़र आते हैं, जिनको व्हील चेयर ने जकड़ लिया है, और इसलिए वे खुद ज़िन्दगी को अलविदा कहना चाहते हैं, पर ख़ास है, उनका रवैया। ज़िन्दगी के आखिरी दिन तक, वह सम्राट की तरह जीतें हैं, और ज़िन्दगी का मज़ा उठाना किसे कहते है, हमें बताते हैं।
मानसिक या शारीरिक रूप से दुर्बल व्यक्ति हम और आप की तरह आम इंसान हैं, वह भी सांस लेते हैं, जीना चाहते हैं, उनके जज़्बात अलग नहीं है, ये हमें बॉलीवुड की फिल्में खुले स्वभाव से बताती हैं।


taare zameen par

"तारे ज़मीन पर" एक ऐसी फिल्म है, जिसमें Dyslexia जैसी बीमारी पर चर्चा की गई है, और ये शिक्षक और माता-पिता को एक सीख देती है, की बच्चों को समझकर उनकी सहायता करनी चाहिए। अव्वल आने की दौड़ में धकेलना गलत है, और जब आमिर खान जैसे सितारे हमें सीख देते हैं, तो हमें अवश्य सही लगता है। :)
ये कहना गलत नहीं होगा, की फिल्मों की सफलता, हमारी हमदर्दी से जुड़ी होती हैं, पर अगर इस हमदर्दी से हम कुछ नया सीखते हैं, और समाज में सुधार आता है, तो यह बिलकुल गलत नहीं है।
लगान जैसी कुछ फिल्मों में विकलांगता को हथियार बनाया गया है, जहां फिल्म का एक पात्र कचरा, पोलियो की वजह से लूला है, अपंग है, पर उसकी यही क्षमता, उसे अच्छा स्पिन बॉलर बनाती है, और मैच में जीत हासिल होती है।


u me aur hum

यू मी और हम, Alzeimer’s Disease से जुडी समस्याओं को दर्शाता है, लेकिन एक रोगी को आपकी सहायता की ज़रूरत है, धैर्य की ज़रूरत है, ये भी हम वहीँ से समझ पाते हैं।
बॉलीवुड की सफलता आज सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, कुवैत, और अमरीका जैसे देशों में भी फैला हुआ है। इस लिए, हर प्रकार के समाज में एक जागरूकता लाना, एक नई सोच को शुरू करना फिल्मों का नैतिक कर्त्तव्य है।
इस प्रचेष्टा में बॉलीवुड आज तक सफल रही है, और हम आशा करते हैं, आने वाले दिनों में भी, बॉलीवुड ऐसे मुद्दों पर समाज में जागरूकता फ़ैलाने का काम करेगा।


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