ग़ज़ल

04 सितम्बर 2016   |  समीर कुमार शुक्ल   (157 बार पढ़ा जा चुका है)

धूप मे धूप साये मे साया हूँ
बस यही नुस्का आजमाया हूँ

एक बोझ दिल से उतर गया
कई दिनों बाद मुस्कुराया हूँ

दीवारें भी लिपट पड़ी मुझसे
मुद्दतों के बाद घर आया हूँ

उसे पता नहीं मेरे आने का
छुप कर के उसे बुलाया हूँ
समीर कुमार शुक्ल


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