ग़ज़ल

04 सितम्बर 2016   |  समीर कुमार शुक्ल   (149 बार पढ़ा जा चुका है)

धूप मे धूप साये मे साया हूँ
बस यही नुस्का आजमाया हूँ

एक बोझ दिल से उतर गया
कई दिनों बाद मुस्कुराया हूँ

दीवारें भी लिपट पड़ी मुझसे
मुद्दतों के बाद घर आया हूँ

उसे पता नहीं मेरे आने का
छुप कर के उसे बुलाया हूँ
समीर कुमार शुक्ल


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 आवा बन्धु,आवा भाई सुना जो अब हम कहने जाए।सुना ज़रा हमरी ये बतिय, दै पूरा अब ध्यान लगाय।कहत हु मैं इतिहास हमारा जान लै हो जो जान न पाए।जाना का था सच वह आपन जो अब तक सब रहे छुपाय।जाना का था बोस के सपना,जो अब सच न है हो पाए।जान लो का था भगत के अपना, जो कीमत मा दिए चुकाय।जाना काहे आज़ाद हैं पाये वीर गत
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