ग़ज़ल

04 सितम्बर 2016   |  समीर कुमार शुक्ल   (157 बार पढ़ा जा चुका है)

धूप मे धूप साये मे साया हूँ
बस यही नुस्का आजमाया हूँ

एक बोझ दिल से उतर गया
कई दिनों बाद मुस्कुराया हूँ

दीवारें भी लिपट पड़ी मुझसे
मुद्दतों के बाद घर आया हूँ

उसे पता नहीं मेरे आने का
छुप कर के उसे बुलाया हूँ
समीर कुमार शुक्ल


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04 सितम्बर 2016
26 अगस्त 2016
@@@@ अपने हुनर को तराश इतना @@@@****************************************************अपने हुनर को तराश इतना ,कि तूदुनिया का सरताज हो जाये |हर ताज रहे तेरी ठोकर में ,और तू बादशाह बेताजहो जाये||अपने इल्म को निखार इतना, कि हर नजर दीदारको बेताब हो जाये |छू ले तू हर बुलन्दी को , और सच्चे तेरे ख्वाबहो जाये
26 अगस्त 2016
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