ग़ज़ल

04 सितम्बर 2016   |  समीर कुमार शुक्ल   (149 बार पढ़ा जा चुका है)

धूप मे धूप साये मे साया हूँ
बस यही नुस्का आजमाया हूँ

एक बोझ दिल से उतर गया
कई दिनों बाद मुस्कुराया हूँ

दीवारें भी लिपट पड़ी मुझसे
मुद्दतों के बाद घर आया हूँ

उसे पता नहीं मेरे आने का
छुप कर के उसे बुलाया हूँ
समीर कुमार शुक्ल


अगला लेख: ग़ज़ल



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
23 अगस्त 2016
मध्यप्रदेशऔरछत्तीसगढ़मेंबाढसेतबाहीमुख्यमंत्री ने अफसरों के साथ समीक्षा की उत्तर प्रदेश में सभी नदियों का जलस्तर बढ़ा मुख्यमंत्री और उनके चाचा एक मंच पर दिखे प्रधानमंत्री पाक अधिकृत कश्मीर पर चिंतित उम्र ने अपना घर संभालने की नसीहत दीदिल्ली का मुख्यमंत्री जनमत संग्रह कराएगाप्रधानमन्त्री को भी काम करना
23 अगस्त 2016
04 सितम्बर 2016
 आवा बन्धु,आवा भाई सुना जो अब हम कहने जाए।सुना ज़रा हमरी ये बतिय, दै पूरा अब ध्यान लगाय।कहत हु मैं इतिहास हमारा जान लै हो जो जान न पाए।जाना का था सच वह आपन जो अब तक सब रहे छुपाय।जाना का था बोस के सपना,जो अब सच न है हो पाए।जान लो का था भगत के अपना, जो कीमत मा दिए चुकाय।जाना काहे आज़ाद हैं पाये वीर गत
04 सितम्बर 2016
22 अगस्त 2016
क्
हैरानी की बात है, ऐसे युग में, जहां सेक्स के बारे में हर जगह से हमें पूरी जानकारी मिल रही है, ताकि इस विषय पर कोई भी अज्ञात ना रहे, हमारे रोज़ के जीवन में इस स्वाभाविक प्राकृतिक हरकत का घटाव नज़र आ रहा है।सांख्यिकीय रूप से जांच करने पर पता चलता है, की 16-44 वर्षीय लोगों में, महिलाएं महीने में ४.५ बा
22 अगस्त 2016
सम्बंधित
लोकप्रिय
04 सितम्बर 2016
09 सितम्बर 2016
04 सितम्बर 2016
22 अगस्त 2016
04 सितम्बर 2016
06 सितम्बर 2016
05 सितम्बर 2016
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x