ग़ज़ल

04 सितम्बर 2016   |  समीर कुमार शुक्ल   (105 बार पढ़ा जा चुका है)

तेरी तरहा मैं हो नहीं सकता
नहीं ये करिश्मा हो नहीं सकता

मैंने पहचान मिटा दी अपनी
भीड़ मे अब खो नहीं सकता

बहुत से काम याद रहते है
दिन मे मैं सो नहीं सकता

कि पढ़ लूँ पलकों पे लिखी
इतना सच्चा हो नहीं सकता

समीर कुमार शुक्ल

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