ग़ज़ल

04 सितम्बर 2016   |  समीर कुमार शुक्ल   (88 बार पढ़ा जा चुका है)

तेरी तरहा मैं हो नहीं सकता
नहीं ये करिश्मा हो नहीं सकता

मैंने पहचान मिटा दी अपनी
भीड़ मे अब खो नहीं सकता

बहुत से काम याद रहते है
दिन मे मैं सो नहीं सकता

कि पढ़ लूँ पलकों पे लिखी
इतना सच्चा हो नहीं सकता

समीर कुमार शुक्ल

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उम्दा शेर कहे हैं समीर जी।कम से कम एक शेर तो और कहिये

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धूप मे धूप साये मे साया हूँ बस यही नुस्का आजमाया हूँएक बोझ दिल से उतर गया कई दिनों बाद मुस्कुराया हूँदीवारें भी लिपट पड़ी मुझसेमुद्दतों के बाद घर आया हूँउसे पता नहीं मेरे आने का छुप कर के उसे बुलाया हूँ समीर कुमार शुक्ल
04 सितम्बर 2016
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