रेल बजट का आम बजट में विलय का विश्लेषण

09 सितम्बर 2016   |  प्रमोद मिश्र   (591 बार पढ़ा जा चुका है)

जब से ये खबर बाजार में आयी है की सरकार अगले साल से रेल बजट को आम बजट में विलय करके पेश कर सकती है तब से लोगो को मन में तमाम तरह के सवाल उठ रहे है जैसे की ,क्या इस विलय से रेलवे को कोई फायदा होगा ,इस विलय से कुछ फायदा होगा भी या नहीं ,क्या सच में इससे फायदा होग या फिर ये मात्र एक बदलाव बनकर रह जाएगा ,ऐसा करने से ट्रेनों में सफर करने वाली जनता का क्या फायदा होगा!लोगो के मन में इस तरह के सवाल उठना लाजमी है और इन सवालो के जवाब मिलना भी चाहिए और अगर रेल बजट का आम बजट में विलय होगातो इस तरह के सवालो का जवाब सरकार द्वारा दियाभीजाएगा!कुछ लोग कह रहे है की इस विलय से रेलवे को फायदा होगा ,कुछ लोग कह रहे है नुक्सान होगा और कुछ लोग कह रहे है की ये विलय मात्र एक बदलाव बनकर रह जाएगा और कुछ नहीं !अब सवाल उठता है की आखिर रेल बजट व आम बजट अलग अलग पेश क्यों किया जाता है? ,इसकी परंपरा क्यों शुरू की गयी ? क्या सोच के रेल और आम बजट को अलग अलग पेश करने की शुरुवात की गयी!सन 1924 में 10 सदस्यो की एक समिति जिसके अध्यक्ष एक अंग्रेज रेलवे अर्थशास्त्री विलियम ऑकवर्थ थे ,ने रेलवे बजट को आम बजट को अलग से पेश करने का सुझाव दिया और तभी से आज तक रेल बजट को आम बजट सेअलग पेश किया जाता रहा है!विलियम ऑकवर्थ ने उस समय ये सुझाव इसलिए दिया था क्योंकि उस समय रेल बजट और आम बजट में वित्तीय बहुत ज्यादा अंतर नहीं था !उस समय रेल बजट आम बजट का लगभग 70% हुआ करता था लेकिन आज की तारिख में रेल बजट आम बजट के 15% से भी काम रह गया है !इसका मतलब ये हुआ की जिस आधार पर रेल बजट को आम बजट से अलग किया गया था उस आधार का ही आज की तारीख में कोई औचित्य नही है!तो इस हिसाब से अगर रेल बजट को आम बजट में शामिल किया जाता है तो इसमें कोई बुराई नहीं है और ये अच्छा ही होगा!अब इस बात पे आते है की इस विलय से रेलवे को क्या फायदा होगा ??हम सभी जानतेहै और अक्सर ऐसा सुनते रहते है की रेलवे अपने 1 रुपये के खर्चे का मात्र 90 से 95 पैसा वसूल पाटा है और हमेसा से घाटे में चल रहा है ,और अब ये बात तो रेलवे ने भी अपने हर टिकेट पे छापना शुरू कर दिया है!रेलवे भारत सर्कार का एक मंत्रालय है जैसे रक्षा ,गृह ,विदेश मंत्रलय इत्यादि जैसे भारत सरकार के अन्य मंत्रालय है लेकिन हम केवल रेलवे के घाटे की बात सुनते है और करते है बाकी मंत्रालयों के घाटे की बात नहीं सुनते है और रेलवे के इसी घाटे का हवाला देकर यात्रियों का किराया बार बार बढ़ाया जाता है और इसका कारन सिर्फ यही है क्योंकि रेल बजट को आम बजट से अलग पेश किया जाता है!इसका मतलब इस हिसाब से भी रेल बजट को आम बजट में मिलाने पे एक तो रेलवे तो द्वारा बार बार घाटे की बात कहकर किराया बढ़ाने जैसी चीजो पे लगाम लगने की संभावना काफी बढ़ जायेगी और इसका सीधा फायदा जनता को मिलेगा !अब आते है तीसरी बात पे-आज की तारीख में अगर रेलवे को कोई नया काम करवाना हो और इसके लिए रेलवे के पास पैसा ना हो तो रेलवे को वित्त मंत्रालय से 8% वार्षिक की दर से लोन लेना पड़ता है जिसको इएम आई के तौर पे रेलवे द्वारा वित्त मंत्रालय को वापस करना पड़ता है और ये काम केवल भारत सर्कार का ये अकेला मंत्रालय करता है क्योंकि बाकी मंत्रालयों को उनके लिखे जोखे के आधार पे उनके लिए बजट आम बजट में से दे दिया जाता है !रेलवे को लोन लेने की जरुरत का सबसे बड़ा कारन ये है की रेलवे का अलग से अपना बजट है!तो इस हिसाब से भी देखने पे अगर रेल बजट को आम बजट में शामिल किया जाता है तो रेलवे को लोन लेने की जरुरत नहीं पड़ेगी और उसके जरुरत के अनुसार बाकी मंत्रालयों की तरह रेल मंत्रालय को बजट उपलब्ध हो जाया करेगा!अब अगर हम वित्तीय आधार पे भी भारत सर्कार के मंत्रालयों की तुलना करे तो भी भारत सरकार के मंत्रालयों में रेलवे से 1.5 से 2 गुना ज्यादा वित्तीय वाले मंत्रालय भी मौजूद है लेकिन उनका बजट अलग से पेश नहीं किया जता तो फिर रेल बजट ही अलग से क्यों??इन सब बातों को देखकर यही लगता है की रेल बजट का आम बजट में शामिल करने से संसद भवन में पेश किये जाने वाले 2-2 बजट से छुटकारा मिलेगा तो इससे लगने वाले समय की बचत होगी व संसद का समय बचने से जनता का पैसा बचेगा व बिना कारन के रेल बजट को आम बजट से अलग पेश करने की परंपरा भी सामाप्त हो जायेगी ! अब प्रश्न ये है की आखिर इस तरह के प्रश्न हमारे मन में उठते कब और क्यों है , दरअसल हम भारतीयों की एक पुरानी आदत शुरू से रही है की हम परम्पराओ को बहुत ही ईमानदारी से निभाते है और निभाते वक़्त हम इन परम्पराओ के पीछे के वैज्ञानिक कारन भी नहीं देखते और ना ही ये कभी सोचते है की इन परम्पराओ को क्यों शुरू की गयी होगी ,बस आँख बंद करके उसको फॉलो करते जाते है लेकिन जब कोई आदमी इन परम्पराओ के साथ छेड़छाड़ करता है या फिर आज की तारीख के औचित्य के अनुसार इन परम्पराओ में कुछ बदलाव करने की कोशिश करता है तो हमारे दिमाग में तमाम तरह के सवाल उठाते है की ऐसा क्यों किया जा रहा है ?,इसकी क्या जरुरत है? ,सब सही तो चल रहा है इसके पीछे क्यों पड़े है? इत्यादि ! रेल बजट को आम बजट में शामिल करने की भी एक परंपरा 1924 में शुरू की गयी जिसको आँख बंद करके हम फॉलो करते चले आ रहे है और ये भूल चुके है की ये परंपरा क्यों शुरू की गयी थी या फिर याद ही नहीं करना चाहते !! एक सरकार आयी है वो चाहती है की इन दोनों का विलय कर दिया जाए और रेल मंत्रालय को भी बाकी मंत्रालय की तरह देखा जाए तो कुछ लोग उसके नफे नुक्सान में लगे हुए है लेकिन एक बात तो तय है की अगर ऐसा करने से लाभ नहीं हुआ तो नुक्सान तो बिलकुल भी नहीं होगा क्योंकि मेरे हिसाब से लाभ और नुक्सान का अनुपात 80:20 होना चाहिए बाकी पाठक समझदार है और वो खुद निर्णय ले सकते है

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