कविता

09 सितम्बर 2016   |  समीर कुमार शुक्ल   (111 बार पढ़ा जा चुका है)

सत्य समर्थन करता हूँ
मैं आत्ममंथन करता हूँ

जड़ता में विश्वास नहीं
नित परिवर्तन करता हूँ

अहंकार की दे आहुति
मैं आत्मचिंतन करता हूँ

हर नए आगंतुक का
मैं अभिनन्दन करता हूँ

मन के चिकने तल पर
वैचारिक घर्षण करता हूँ

अगला लेख: ग़ज़ल



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
04 सितम्बर 2016
तेरी तरहा मैं हो नहीं सकता नहीं ये करिश्मा हो नहीं सकतामैंने पहचान मिटा दी अपनी भीड़ मे अब खो नहीं सकताबहुत से काम याद रहते है दिन मे मैं सो नहीं सकताकि पढ़ लूँ पलकों पे लिखी इतना सच्चा हो नहीं सकतासमीर कुमार शुक्ल
04 सितम्बर 2016
04 सितम्बर 2016
तेरी तरहा मैं हो नहीं सकता नहीं ये करिश्मा हो नहीं सकतामैंने पहचान मिटा दी अपनी भीड़ मे अब खो नहीं सकताबहुत से काम याद रहते है दिन मे मैं सो नहीं सकताकि पढ़ लूँ पलकों पे लिखी इतना सच्चा हो नहीं सकतासमीर कुमार शुक्ल
04 सितम्बर 2016
07 सितम्बर 2016
आज का सुवचन
07 सितम्बर 2016
08 सितम्बर 2016
आज का सुवचन
08 सितम्बर 2016
21 सितम्बर 2016
को
@@@@@@कोई किसी का नहीं@@@@@@******************************************************मुख्य फसल के बीच पनपा ,वह एक खरपतवार था |मातपिता की सन्तानों में ,उसका नम्बर चार था ||माँ की ममता से वंचित ,वो एक ऐसा बच्चा था |युवा हो जाने पर भी ,जो दुनियादारी में कच्चा था ||माँ की ममता का प्यासा,भाभी को माँ समझ बैठ
21 सितम्बर 2016
06 सितम्बर 2016
आज का सुवचन
06 सितम्बर 2016
09 सितम्बर 2016
आज का सुवचन
09 सितम्बर 2016
26 अगस्त 2016
@@@@ अपने हुनर को तराश इतना @@@@****************************************************अपने हुनर को तराश इतना ,कि तूदुनिया का सरताज हो जाये |हर ताज रहे तेरी ठोकर में ,और तू बादशाह बेताजहो जाये||अपने इल्म को निखार इतना, कि हर नजर दीदारको बेताब हो जाये |छू ले तू हर बुलन्दी को , और सच्चे तेरे ख्वाबहो जाये
26 अगस्त 2016
04 सितम्बर 2016
धूप मे धूप साये मे साया हूँ बस यही नुस्का आजमाया हूँएक बोझ दिल से उतर गया कई दिनों बाद मुस्कुराया हूँदीवारें भी लिपट पड़ी मुझसेमुद्दतों के बाद घर आया हूँउसे पता नहीं मेरे आने का छुप कर के उसे बुलाया हूँ समीर कुमार शुक्ल
04 सितम्बर 2016
23 सितम्बर 2016
जब भी मेरा भारत महान होता हैमेरा दिल सारे जहाँ से अच्छाहिन्दोस्तां होने को बेताब होता हैघूसखोर हाथों से जब तिरंगा फहरता हैमेरा दिल क्यों इतना कहरता हैबापू तुम तो भ्रष्ट ऑफिसों में टंगे होघुस के लिफाफे में लाखों करोङो में बंधे होतुम्हारे आज़ाद बन्दर न बुरा देखते हैंन बुरा सुनते है न ही बुरा कहते हैसि
23 सितम्बर 2016
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x