कविता

09 सितम्बर 2016   |  समीर कुमार शुक्ल   (130 बार पढ़ा जा चुका है)

सत्य समर्थन करता हूँ
मैं आत्ममंथन करता हूँ

जड़ता में विश्वास नहीं
नित परिवर्तन करता हूँ

अहंकार की दे आहुति
मैं आत्मचिंतन करता हूँ

हर नए आगंतुक का
मैं अभिनन्दन करता हूँ

मन के चिकने तल पर
वैचारिक घर्षण करता हूँ

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