अम्मा! दादू बूढ़ा है - एस. कमलवंशी

11 सितम्बर 2016   |  एस. कमलवंशी   (435 बार पढ़ा जा चुका है)

अम्मा! दादू बूढ़ा है - एस. कमलवंशी

अम्मा! दादू बूढ़ा है,
कचरा, करकट कूड़ा है,
क्यों न इसे फेंक दें, तपती धूप में सेंक दें!

तुम ही तो कहती हो ये खाँसता है,
चलते चलते हाँफता है,
कितना भी खिलाओ अच्छा इसको,
फिर भी हमेशा माँगता है…
न कहीं जाता है, न कुछ करता है,
खटिया पर पड़े पड़े सड़ता है,
अंधा है, बहरा है, चाल तो देखो लंगड़ा है,
ज़ोर नहीं रत्ती भर फिर भी कितना लड़ता है।

इसे देख बापू झल्लाते हैं,
सामने ही दाँत किटकिटाते हैं,
कहते हैं मर क्यों नहीं जाता,
कब से ज़िंदा है, जग से तर क्यों नहीं जाता।
अब क्या बचा है जिसके लिए ज़िंदा है,
इसकी वजह से जीवन शर्मिंदा है,
कहते हैं, जायदाद में कुछ नहीं इसके पास,
जो है, उसपे इसका शिकंजा है।

अम्मा! दादू बूढ़ा है,
कचरा करकट कूड़ा है,
क्यों न इसे जला दें, या फिर ज़हर पिला दें!

अम्मा! एक बात कहूँ, मारोगी तो नहीं!
दादू जैसा बंद कमरे में डालोगी तो नहीं!

अम्मा! दादू अच्छा है,
मेरी तरह बच्चा है,
अम्मा! दादू रोता है,
हम सबके बावजूद अकेला होता है,
जानती हो, वह सुनता भी है,
मन ही मन कुछ बुनता भी है।
बापू के तानों पर सहम जाता है,
रूखा सूखा जो दिया सब खाता है,
वह चल नहीं पाता फिर भी गाँव जाता है,
सोना हो या सूखे बेर, हमारे लिए ही लाता है।

दादू अब भी बापू को चाहता है,
तुम्हें बेटी उन्हें बेटा मानता है,
भले तुम उसे बुरा कहो, गाली दो,
दादू परिवार जानता है, दुआ जानता है।

अम्मा! कुछ दिन बाद दादू मर जाएगा,
तो मुझे कहानी कौन सुनाएगा?
चोट लगेगी तो कौन चुप कराएगा?
तम्बाखू के चार पैसे मेरे लिए धोती में कौन छुपाएगा,
मेरी शरारत पर कौन हँसेगा?
तू मेरे जैसा है, मुझे कौन बताएगा?
मुझे खिलौना नहीं चाहिए, मिठाई नहीं चाहिए,
मुझे दादू चाहिए, मैं दादू कहाँ से लाऊँगा?

अम्मा! दादू बूढ़ा है,
कचरा करकट कूड़ा है,
बेकार सही लाचार सही,
हम बिन वह अधूरा है,
क्यों न उसे प्यार दें! अपने पाप उतार दें!

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लाजवाब

सुन्दर रचना

मंजरी सिन्हा
26 अप्रैल 2019

सच मच बहुत ही मन को छूने वाली कृति है | अच्छी रचना के लिए बहुत बहुत शुभ कामनाएं

अलोक सिन्हा
25 अप्रैल 2019

बहुत सशक्त रचना है | हर दृष्टि कौण से | पूरी तरह निखरी , मजी हुई | मन के बहुत भीतर तक उत र जाने वाली | सहेज कर रखिये |

विश्वमोहन
25 अप्रैल 2019

अद्भुत रचना, आज की हकीक़त को उजागर कराती और मानवीय संवेदना को उकेरती!!! बधाई और आभार!!!

Sudha Singh
25 अप्रैल 2019

बहुत बहुत सुंदर बहुत

रेणु
24 अप्रैल 2019

जी नमस्ते,

आपकी लिखी रचना गुरुवार २५ अप्रैल २०१९ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

AJIT SINGH
20 सितम्बर 2017

बहुत सुंदर रचना है बहुत कुछ कह दिया।

दिलों को बेध देने वाली रचना। कमलवंशी जी आपकी विचारों को नमन।

धन्यवाद ऋषभ जी।

सबको बूढा होना है ये सबका ही रोना है।
आधुनिकता के इस प्रसार में आगे बस ये ही होना है।
हमें चेतना होगा आज , बदलना होगा ये समाज।
संस्कारों के मोतियों को फिर से बाल मनों में पिरोना है।
सबको बूढ़ा होना है।

अत्यंत सुंदर पंक्तियाँ। धन्यवाद।

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