अंधा क़ानून

12 सितम्बर 2016   |  राजेन्द्र मल्ल   (138 बार पढ़ा जा चुका है)

अंधा क़ानून

जेल के भीतर ..... कहीं दुबका, सुशासन रो रहा है..... बाहर एक मवाली गुंडा , मदमस्त हो रहा है...... शर्मसार है मानवता, अँधा कानून सो रहा है..... अट्टहास करता आज एक शैतान, भगवान हो रहा है...... आक्थू ! ऐसी व्यवस्था पर , कि समाज श्मशान हो रहा है......


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