हिन्दी हूँ मैं....

12 सितम्बर 2016   |  जेपी हंस   (124 बार पढ़ा जा चुका है)

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,

बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल.

उपरोक्त पंक्तियाँ भारतेंदु हरिश्चंद ने हिंदी के बारे में वैसे समय में लिखी, जब उन्हें लगा कि अब हिंदी के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है । इसी खतरे को भांपते हुए उतरोत्तर समय में 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी । हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है ।

वैसे जो ऐसी कल्पनाएं करके ही खुश होते है कि हिंदी दिवस मनाने वाले मानते हैं कि भाषा का संकट है, तो उन्हें अपनी खुशगहमी दूर कर लेनी चाहिए, क्योंकि यह दिन मनाना संकट का घोतक नहीं, बल्कि अपने ही देश में, सैलानियों की तरह रह रहे लोगों को याद दिलाने का तरीका है कि मुखौटे उतारो और सच्ची जबान बोलो ।

अपनी भाषा बोलने में हिचक होने और आत्म-विश्वास की कमी को कारण हमारे स्वतंत्रता पूर्व और स्वाधीनता प्राप्ति के बाद के शासन की गलत शिक्षा नीतियों के कारण हिंदी उपेक्षा की शिकार रही है । जिस स्वाधीनता संग्राम को भारतीय भाषाओं ने लड़ा, उसी स्वाधीनता के प्राप्ति के बाद उन्हें दरकिनार कर दिया गया । स्वाधीनता प्राप्ति के सारे दस्तावेज ही न केवल अंग्रेजी में हस्ताक्षरित किये गये, बल्कि आधी रात को देश के प्रथम प्रधानमंत्री का स्वाधीनता प्राप्ति का पहला भाषण ही अंग्रेजी में दिया गया । यही वह क्षण था, जहाँ से हिंदी ही नहीं, तमाम भारतीय भाषाओं की दुर्गति शुरू हुई ।

हमारी हिचकिचाहट हमारी मनोवैज्ञानिक दासता में अंतर्निहित है । उसके ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय कारण उतने नहीं है, जितने मनोवैज्ञानिक और वर्गीय कारण हैं । स्वाधीनता के तत्काल बाद स्वाधीनता संग्राम के उन्हीं नेताओं को, जो नई सरकार में मंत्री बनाए गए । उन्हें लगा कि अब वे जनता से कुछ अलग और विशिष्ट हो गए है, क्योंकि अब वे शासक हो चुके थे । उनके सामने यह समस्या हुई कि वे जनता से अलग दिखने के लिए क्या करे, तो उन्हें पहला हथियार मिला भाषा का । उन्होंने तत्काल अपने कामकाज की भाषा के लिए अंग्रेजी को चुन लिया ।

एक क्षेत्र-विशेष के प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले कुछ लोग तो राजनितिक रोटियां सेकने में अरसे से हिंदी विरोद्ध का झंडा उठाते रहे हैं । जब यूपीएससी में हिंदी को लागू करने की बात उठी तो एक बार फिर से सक्रिय रूप से उसके विरोध पर उतर आये थे, अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करने तक पर उन्हें एतराज है यानि अपने ही देश में हिंदी लगातार विरोध के चक्रव्यूह में फंसती और लड़ती रही है । सरकारी स्तर पर उसे आज तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिला है मगर कमाल यह है कि इतने सबके बाद भी हिंदी न हारी, न टूटी, न मरी, न गई अपितु आज दुनियाभर में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में शुमार है तथा चीनी या मंडारिन के बाद उसका दूसरा स्थान है । भले ही हिंदी उस देश में ठिटकी खड़ी है, जहाँ सब उसके अपने है, पर एक बेगानेपन से त्रस्त होकर भी उसने उम्मीद नहीं छोड़ी है और हिंदी में जबरदस्त वृद्धि हो रही है, उसकी पठनीयता और साहित्य कुलांचे भर रहा है और कह रहा है हिन्दी हूँ मैं

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