दो रुबाई

12 सितम्बर 2016   |  आलोक सिन्हा   (112 बार पढ़ा जा चुका है)

खुद पसंदी है फितरते इन्सा ,

जो अपनी कमियों को भूल पाता हो

देख कर खुद को आइने में आप

कौन है जो न मुस्कुराता हो

नजर बरनी

सालहा साल की तलाश के बाद

जिन्दगी के चमन से छांटे हैं

आपको चाहिये तो पेश करूं

मेरे दामन में चंद कांटे हैं |

नजर बरनी

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