भिखारी - एस. कमलवंशी

17 सितम्बर 2016   |  एस. कमलवंशी   (226 बार पढ़ा जा चुका है)

भिखारी - एस. कमलवंशी

मेरी गली में इक भिखारी भीख मांगता है,
नंगे पाँव, तपती धूप में,
सर्दी-गर्मी, हर रूप में,
चंद मुट्ठी पैसों से, घर का पेट पालता है,
मेरी गली में इक भिखारी, रोज भीख मांगता है।।

टूटे घर में बिखरा जीवन,
खाली पेट, और गीला दामन,
नींद खुले जब, देखें आखें,
मरती त्रिया, भूखा बचपन।
बेबसी में, बेकसी में हर बाधा वह लांघता है,
मेरी गली में इक भिखारी, रोज भीख मांगता है।।

चिथड़े कुथड़े लिपटे तन पर,
लाख दुआएं उसके लब पर।
दर-दर जाकर, मिलता दूभर,
हाथ जोड़े, कभी पैर छूकर।
अंधे-अमीरों के पीछे, एक आस लिए भागता है,
मेरी गली में इक भिखारी, रोज भीख मांगता है।।

हाथ फैलाए, थोड़ा गिड़गिड़ाए,
कमजोर पैर, थोड़ा लड़खड़ाए,
फटकार खाए, पर चुप लौट आए,
देख हालत, थोड़ा बड़बड़ाए।
हाथ मले और पैर छने, वह पूरा दिन काटता है,
मेरी गली में इक भिखारी, रोज भीख मांगता है।।

आँखों में नमी, पैसों की कमी,
सपने धूमिल, हसरतें थमीं,
कचरा पेटी - पकवान-भवन,
फेंके टुकड़ों पर नज़र जमीं।
चैन की नींद, सब झूठी बातें, वह भूखे पेट जागता है,
मेरी गली में इक भिखारी, रोज भीख मांगता है।।

देखा उसको, मेरी आहें निकलीं,
मौत मिले, पर न ग़म की बदली!
मित्र कहे, ईश्वर की माया,
कल के करम, तकदीर हैं अगली।
तुझसे बने वह दे देना, तेरा खुदा तुझे जानता है,
मेरी गली में इक भिखारी, रोज भीख मांगता है।।

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रेणु
27 अप्रैल 2017

सच में बहुत बढ़िया लेखन है आपका -- वैरी गुड

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