बेटियाँ

21 सितम्बर 2016   |  चंदर शेखर मनकोटिया   (119 बार पढ़ा जा चुका है)

बेटियाँ

फूलों की तरह खिलखिलाती हैं।
खुशबू की तरह मेहकाती हैं।
परियों का रूप लेकर आती हैं।
सबकी किस्मत में नहीं होती,
किसी किसी घर को ही रोशनाती हैं बेटियां।

दुखों में साथ कभी न ये छोड़ती।
अपनों से कभी मुंह नहीं मोड़ती।
अकेले में बैठ कर चाहे घंटों रो लें।
सामने हर दुःख हंस के जर लेती हैं बेटियां।

न चाहते हुए भी चुप रहती हैं।
अपनों की जुदाई हंस कर सहती हैं।
कोई दाग ना आये बाप की पगड़ी पर,
बस चुपचाप पराये घर की और चल देती हैं बेटियां।

दूर जब जाना है, तोह रोना ही है।
दस्तूर है दुनिया का, ऐसा होना ही है।
खुद चाहे कितने भी बुरे हालातों से गुजरें,
मुसीबत में माँ बाप का साथ निभा जाती हैँ बेटियां।

बुढ़ापे में आकर ये सहारा बन जाएँ।
अपने हाथों से खाना ये खिलाएं।
बेटे चाहे ठोकर भी मार दें।
अपना फ़र्ज़ निभा जाती हैँ बेटियां।

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