कोई किसी का नहीं

21 सितम्बर 2016   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (105 बार पढ़ा जा चुका है)

@@@@@@कोई किसी का नहीं@@@@@@

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मुख्य फसल के बीच पनपा ,वह एक खरपतवार था |

मातपिता की सन्तानों में ,उसका नम्बर चार था ||

माँ की ममता से वंचित ,वो एक ऐसा बच्चा था |
युवा हो जाने पर भी ,जो दुनियादारी में कच्चा था ||
माँ की ममता का प्यासा,भाभी को माँ समझ बैठा |
उसका यह भ्रम एक दिन ,उसके दिल को ले बैठा ||
सबसे प्रिय मुझे आप है,क्या मैं भी आपका हूँ प्रियतम |
उत्तर सुनकर इस प्रश्न का,उसको हुआ था भारी गम ||
हाथ पकड़ कर जो लाता है ,वो ही होता है प्रियतम |
माँ बनी भाभी जब बोली,तो आँखें उसकी हुई थी नम ||
किसी का प्रीतम बनने खातिर ,शादी उसने कर डाली |
पर ईच्छा पूरी हुई न उसकी,आ गयी ऐसी घरवाली ||
भृतहरि की कहानी पढ़ कर ,हुआ उसको सत्य ज्ञान |
दुनिया की दुनियादारी को, लिया उसने भी जान ||
प्यार के बदले प्यार मिलेगा ,यह भ्रम उसका टूट गया |
तथाकथित अपनों से उसका,फिर मोह सहज ही छूट गया ||
कोई किसी का नहीं है जग में,यह लिखा भाभी ने एक बार |
पर इस कटु सच्चाई से ,सामना होता बारम्बार ||
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