स्कैच --- तीन मित्र तीन बात ( दूसरे मित्र का विवरण )

22 सितम्बर 2016   |  आलोक सिन्हा   (166 बार पढ़ा जा चुका है)

स्कैच --- तीन मित्र तीन बात ( दूसरे मित्र का विवरण )


मेरे एक घनिष्ट मित्र हैं -- - अखिल कुमार सरल | ये aअपनी कोई भी छोटी बड़ी बात मुझसे नहीं छिपाते | वह चाहे ऑफिस की हो या घर की , प्यार की हो या किसी से मन मुटाव की | जब भी मिलते हैं इतने निःसंकोच होकर मिलते हैं कि कभी कभी लोग हम दोनों को मित्र की जगह सगे सम्बन्धी होने का संदेह करने लगते हैं |

मेरे इन मित्र का विवाह हुये वैसे तो एक दशक से अधिक हो गया है , पर ये अपनी पत्नी कनक को अभी दो माह पूर्व ही पहली बार उसके घर से विदा करा कर लाये हैं | दरअसल इन दोनों के माता पिता एक ही गाँव में रहते थे और घनिष्ट मित्र थे | उन्होंने बचपन में ही इन दोनों की शादी कर दी थी | पर शादी के कुछ दिन बाद ही पिताजी की आकस्मिक मृत्यु हो जाने से अखिल अपने मामा के पास शहर आ गया और अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद एक इन्टर कालिज में प्रवक्ता हो गया | पर कनक गाँव में कोई जूनियर हाई स्कूल न होने के कारण केवल कक्षा ५ तक ही पढ़ पाई | यही कारण था जो अखिल उसे विदा करा कर लाने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे |

कनक भाभी के आने के बाद मैं अपने इन मित्र में एक बड़ा परिवर्तन अनुभव कर रहा हूँ | वस्तुतः वह एक प्रवक्ता होने के साथ साथ एक बहुत अच्छे कवि भी हैं |कनक उनकी तुलना में कहीं भी तो जरा सी उनके समकक्ष नहीं बैठती |यही कारण है कि अब अखिल मुझसे पहले की तरह न तो कभी हंस कर मिलते हैं ,न अधिक खुल कर बातें करते हैं |
एक दिन रविवार को मैं चाय पीकर अपने कमरे में बैठा अख़बार पढ़ रहा था कि अचानक मेरे यही मित्र मेरे पास आये और बिना किसी सन्दर्भ के एक गहरी सांस लेकर बोले
-- बन्धु , तुम्हारे मँजे हैं | कहीं आओ , कहीं जाओ , जो मर्जी आये सो करो | और एक हम हैं | किस्मत के मारे | घर की चार दिवारी में बंद |न खुल कर हंस सकते हैं , न रो सकते हैं |

मैंने धीरे से अखबार मेज पर खिसकते हुए पूछा ----`` भाभी तो ठीक हैं | ``

हाँ ठीक हैं | एक मरा सा उत्तर मिला | मैंने फिर उनके मन की बाट टटोलने की दृष्टि से पूछा -- तो फिर सुस्त से क्यों हो ?

`` कुछ नहीं ठीक हूँ | ``

उन्होंने वैसे ही नीची गर्दन किये कहा | अब मेरी समझ आ गया कि आज ये हजरत कुछ ज्यादा ही परेशान हैं | में फिर अपनी कुर्सी से उठ कर उनके बराबर ही जाकर बैठ गया और बोला --`` देखो ! जब तुम्हें पता हैं कि भाभी तुम जैसी ज्ञान वांन नहीं हैं तो धीरे धीरे उनसे विभिन्न विषयों पर बाँतें करके उनका ज्ञान वर्धन करने की कोशिश क्यों नहीं करते हो | ``

मेरी बात सुनकर वो अपनी गम्भीर मुद्रा छोड़ कर कुछ हल्का सा मुस्कुराते हुए बोले --`` ज्ञान वर्धन ! वो भी तुम्हारी भाभी का | भइया जी ! मैं उनका ज्ञान वर्धन क्या करूंगा , वो तो रोज मेरा ज्ञान वर्धन कर रहीं हैं | कल ही की बात बताऊँ | में अपने कमरे में बैठा एक नई कहानी लिखने की सोच रहा था कि अचानक तुम्हारी भाभी मेरे पास आकर बैठ गईं और बोलीं --`` आप यहाँ अकेले बैठे क्या कर रहे हैं ? ``

तो मेरे मुँह से बस वैसे ही सहज भाव से निकल गया कि एक नई कहानी लिखने की सोच रहा था | तो वो बोलीं -- आप कैसे लिखते हैं कहानी | कहानी में कौन कौन होता है |

मैंने कहा कि कहानी में एक नायक होता है और एक नायिका | तो वो एक साथ बोलीं -- `` हर कहानी में ये नाई का क्या करता है ? क्या हर कहानी में कलाकारों के बाल काटने की जरूरत होती है |``

मैंने फिर उन्हें समझाते हुए कहा कि मेरा मतलब हीरोइन से था तो वो पहले से भी दो कदम आगे बढ़ कर बोलीं ---आप हीरोइन वीरोइन के चक्कर में मत पड़िए | यह तो बहुत बुरी चीज है | हमारे गाँव में दो लडकों की जेबों में बस इसकी एक एक पुडिया मिली थी तो पुलिसे ने उनकी खूब पिटाई भी की और वो अभी तक जेल में बंद हैं |``

मुझे उस समय हंसी तो बहुत आ रही थी पर मैनें पूरी तरह अपने पर अंकुश रखते हुए अखिल से कहा -

`` गाँव में रहने के कारण जरा भाभी का शब्द ज्ञान कम है , इसलिए उन्होंने जो कुछ कहा उस पर अधिक ध्यान नहीं देना चाहिए | धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा |``

`` पर मुझे बिलकुल उम्मीद नहीं लगती |`` वो एक गहरी साँस लेकर बोले - ``आज जब सारी बातें खुल कर हो ही रही हैं तो मैं भी तुम से अब कुछ नहीं छिपाऊंगा | बन्धुवर , गत दो माह में मैंने जो कुछ देखा व् अनुभव किया है , उस से मुझे यह बिलकुल नहीं लगता कि कनक के पास मस्तिष्क जैसी भी कोई चीज है | एक दिन की बात बताऊँ | में अपने कमरे में बैठा धर्मयुग पढ़ रहा था कि तभी तुम्हारी भाभी मेरे पास आकर खड़ी हो गई | मैं उनकी तरफ एक उचटती सी निगाह डालते हुए कहा क्या एक गिलास पानी मिल सकता है |तो वो बिना कुछ उत्तर दिये जल्दी से अंदर रसोई में चली गई और एक क्षण में ही मुझे पानी लाकर दे दिया | मुझे उनकी सरलता देख कर कुछ मजाक करने का मन कर आया मैंने एक घूट पानी पीकर उनसे कहा -- अरे ! क्या तुम पानी में कुछ डाल कर लाई हो | बहुत ही मीठा लग रहा है |

तो वो तुरन्त आगे बढ़ कर मेरे हाथ से गिलास लेकर बोली -- नहीं ,नहीं हमने तो इसमें कुछ नहीं डाला | आपको अच्छा नहीं लग रहा है तो हम दूसरा लाये देते हैं |

मैं , उनके शीघ्रता से गिलास ले लेने के बाद एक क्षण के लिए ठगा सा बैठा रह गया | मैं सोच रहा था कि जब वो ये कहेंगी कि हमने तो इसमें कुछ नहीं मिलाया तो मैं कहूँगा कि फिर यह शायद तुम्हारे छूने से मीठा हो गया होगा | कहीं अगर तुम इसे चख कर देख लेतीं तो ये शायद अमृत हो जाता | पर उन्होंने तो एक साथ हाथ से गिलास लेकर सारा प्रसंग ही समाप्त कर दिया |``

मैंने कहा कि वो तुम्हें मन से प्यार करतीं हैं | तुम्हें किसी भी बात का बुरा लगना वो भला कैसे सहन कर सकती थीं |
हाँ , ये बात तो है अखिल ने सहमति जताते हुए कहा ---`` प्यार तो वास्तव में कनक बहुत करती है | फिर कुछ मुस्कुराते हुए बोले --`` एक दिन कह रही थी कि मैं अपने गाँव में सब से ज्यादा भाग्य शाली हूँ जो मेरी आपसे शादी हुई | मेरे साथ की जितनी भी लडकियाँ हैं सभी के दूल्हे विदेशों में नौकरी कर रहे हैं और वो सब बेचारी अकेली गाँव में पड़ी हैं | मैंने उसकी बात सुन कर उससे तो कुछ नहीं कहा पर मन ही मन सोचा कि तुम सबसे दुर्भाग्यशाली हो जिस की मुझ जैसे छोटी सी नौकरी वाले लड़के से शादी हुई है |``

मैंने कहा -- वैसे अखिल , भाभी के ह्रदय में मुझे जो आत्मां दिखाई दे रही है ,वह कोई साधारण आत्मा नहीं है | इतनी लम्बी प्रतीक्षा के बाद ससुराल आना और फिर इतने समर्पण भाव से माँ की सेवा व् तुम्हारी हर आवश्यकता का ध्यान रखने का गुण आज कल की लड़कियों में सुगमता से देखने को नहीं मिलता |a

`` पर इस सेवा भाव व् थोड़ी सी दबी छिपी प्यार की अनुभूति के सहारे क्या सारा जीवन काटा जा सकता है | क्या जीने के लिए प्यार की मुखरता तनिक भी आवश्यक नहीं है | चलो ! मेरी कल्पनाओं के पंखों की उडान में कोई परी बन कर मेरा साथ न दे , पर कम से कम धरती पर तो मैं किसी से अपनी मीठी मुस्कानों के द्वारा सारे दिन की नीरस थकन को सहलाने की अपेक्षा कर सकता हूँ |``

मैंने फिर इस प्रसंग को अधिक आगे नहीं बढ़ाया | क्योंकि अखिल की पीड़ा यदि बहुत अधिक गम्भीर नहीं थी तो ऐसी भी नहीं थी कि उसे पूरी तरह नकार दिया जाये |

इसके बाद हम दोनों काफी दिन तक एक दूसरे से नहीं मिल सके | मैं कार्यालय में राजकीय निरीक्षण के चलते काफी व्यस्त रहा और मेरे मित्र अर्ध वार्षिक परीक्षाओं व् उत्तर पुस्तकों के मूल्यांकन में उलझे रहे | इसी अन्तराल में मुझे एक दिन अपने एक सहयोगी से पता चला कि कवि जी का किसी कवयित्री महोदया से प्रेम प्रसंग चल रहा है और वो शीघ्र अपनी पत्नी से सम्बन्ध विच्छेद करने जा रहे हैं |

मैं जब उसी शाम उनके घर उनसे मिलने पहुँचा तो उन्हें नितान्त अँधेरे कमरे में चुपचाप लेटा हुआ देख कर मुझे विश्वास हो गया कि वो वास्तव में किसी गहरे अवसाद में हैं और उजाले से मुँह छिपा रहे हैं |पर उनहोंने जैसे ही मुझे देखा तो तुरन्त उठ कर मुझसे हंसते हुए बोले -- सच आज मुझे तुम्हारी बहुत याद आ रही थी | एक तुम ही तो हो जिस से में अपनी हर बात कह कर मन का बोझ हल्का कर लेता हूँ | दरअसल मेरी एक बहुत बड़ी प्रशंसक कवयित्री मुझसे शादी करना चाह रही है | वह दो भाई व् एक भीं हैं

और वह इस समय एक कन्यां इन्टर काँलिज में सहायक अध्यापिका है | उसका कहना है कि अगर मैं अपनी पत्नी से सम्बन्ध विच्छेद कर लूं तो वह मुझसे तुरन्त विवाह करने को तैयार है | `` तो अब तुम्हारा क्या विचार है ? ``

अखिल ने कहा --- `` मैं जब कुछ दिन पूर्व इस सम्बन्ध में एक अधिवक्ता महोदय से मिला तो उनहोंने मुझसे कहा कि पहले मैं इस विषय में अपनी पत्नी से बात करके देखूं | यदि वह सहमत हो जाती हैं तो वो मेरे सम्बन्ध विच्छेद का काम बहुत शीघ्र करा देगें | फिर एक दिन मैंने जब कनक का अच्छा मूड देख कर उससे बड़े प्यार के साथ पूछा -- अगर मैं दूसरी शादी कर लूं तो तुम्हें कैसा लगेगा ? - मेरी बात सुन कर वह बड़ी खुश होती हुई मेरी ओर देख कर बोली ---`` क्या आप दूसरी शादी कर रहे हैं | पर किसी खूब पढ़ी लिखी लड़की से शादी कीजिये | मैं तो कम पढ़ी लिखी होने के कारण आपसे अच्छी तरह बात तक नहीं कर पाती | न आपकी कविताएँ समझ पाती हूँ | न आपकी कहानियों की प्रशंसा कर पाती हूँ | इसलिए आप घर में सारे दिन अकेले से और उदास रहते हैं |सच कभी कभी तो मुझे आपको परेशान देख कर बहुत ही रोना आता है | सोचती हूँ कि पत्नी का काम तो हर तरह पति को खुश रखने का होता है | पर मैं चाहते हुए भी आपको जरा सी खुशी नहीं दे पाती | सच आप दूसरी शादी कर लीजिये | फिर मुझे भी एक सहेली मिल जायेगी और मैं अम्मा जी की सेवा भी अधिक अच्छी तरह कर पाऊँगी |``

अखिल ने जब ये सारी बात अपनी प्रशंसक महोदय को बताई तो वह बहुत खुश होकर उससे बोली ---`` चलिए यह तो बहुत अच्छा हुआ कि कनक अपने आप ही हमारे बीच से हट गई | वैसे आपसे अलगाव हो जाने के बाद भी वह अगर हमारे घर में माँ जी की सेवा करने के लिए रहना चाहती है , तो मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है | क्योंकि देखिये ! शादी के बाद हम दोनों की नौकरियाँ अलग अलग

नगर में होने के कारण हमें माँ जी की देख भाल , खाना , झाड़ू पोंछा , कपड़े आदि के लिए कुछ न कुछ इंतजाम तो करना ही पड़ेगा | हो सकता है मान जी की देख भाल व् अन्य कामों के लिए अलग अलग दो नौकरानियां भी रखनी पड़ें | इससे तो यही अच्छा है कि कनक को घर में रहने दिया जाये | हमारे काफी पैसे भी बच जायेंगे और वह आसानी से सभी काम भी संभाल लेगी |

अखिल ने वैसे ही मरे मन से हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा ---हाँ , ये बात तो है |

वह फिर आगे बोली--`` देखो ! अगर हम गहराई से सोचें तो कनक के घर में रहने से हम दोनों को भी विवाह के बाद पूर्ण स्वतन्त्रता से हर सुख सुविधा का आनन्द लेने का अवसर मिल जायेगा | आप फिर छुट्टियों में माँ की चिंता किये बिना आराम से यहाँ कितने ही दिन रह सकेंगे | सच मेरे मम्मी पापा बहुत अच्छे हैं | आप उनसे बातें करके बहुत खुश होंगे | ``

अखिल ने फिर उससे पूछा ---`` क्या तुम शादी के बाद भी ये छोटी सी नौकरी जारी रखोगी ?

तो वह बोली ---क्यों ! इसमें क्या हर्ज है | कुछ पैसा ही तो घर में आएगा | फिर घर में खाली पड़े पड़े मैं करूंगी भी क्या |``

अखिल ने अपना मत स्पष्ट करते हुए कहा - - ``देखो ! मैं सर्विस के खिलाफ नहीं हूँ | पर उससे कुछ लाभ तो हो |जितना तुम कमाती हो उतना तो मैं एक ट्यूशन से घर बैठे कमा सकता हूँ | फिर तलाक के बाद क्या कनक को पूरे घर और माँ की जिम्मेदारी सोंपना हमारे लिए ठीक रहेगा |`` वह बोली ---`` नहीं , मुझसे अभी नौकरी छोड़ने के लिए अधिक मत कहिये |``

इसके बाद मेरे मित्र वहाँ अधिक नहीं रुके और अपने घर के लिए चल दिये | रास्ते भर वो यही सोचते रहे कि कनक अनपढ़ होने पर भी वैवाहिक जीवन की गहराइयों को कितनी सूक्ष्मता से समझती है | जब कि ये इतना पढ़ लिखने के बाद भी किसी दायित्व के प्रति गम्भीर नहीं है |इसे न माँ से कोई लगाव है न घर से | न मेरे किसी सुख दुःख की चिता है , न मेरे पास रहने की विशेष उत्सुकता | दूसरी ओर एक कनक है , जो हर पल बस इस बात के लिए परेशान रहती है कि वह कैसे मुझे व् माँ को हर

सुख प्रदान करे | बताइये ! अभी तलाक नहीं , शादी नहीं , कनक मेरी वैधानिक पत्नी है और वह उसे ही मेरे सामने नौकरानी की संज्ञा दे रही थी | मैं ऐसी पत्नी का क्या करूंगा | इससे तो मेरी कनक लाख गुना अच्छी और समझदार है |
जब विभिन्न विचारों में डूबे वह अपने घर पहुंचे तो कनक दरवाजे पर खड़ी न जाने कब से उनके आने की प्रतीक्षा कर रही थी | उन्हें देखते ही घोर चिंता से भरी कुछ सलवटें मांथे पर डालती हुई उनसे बोली --- ``
आज आप कहाँ रह गये थे | हमारी तो चिता के मारे जान निकली जा रही थी | डर के कारण न हमसे नहाया गया न सुबह से अब तक चाय ही पी गयी | बस जैसे ही माँ जी नहा कर , खाना खा कर सोईं , हम यहीं चौखट पर बैठे आपकी राह देख रहे हैं | ``

कनक की भोली सी आक्रति व् मन के कोने कोने में बसे प्यार व् समर्पण भाव को देख कर मेरे मित्र एक पल अपने मन पर संयम नहीं रख सके और कनक को तुरन्त बाँहों में भर कर चिपटाते हुये बोले ---`` आज के बाद अब कभी इतनी देर नहीं होगी | ये मेरा तुमसे वादा है | ``

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