भारत के विकास का कार्य प्रगति पर है पर रूकावट के लिए खेद है

27 सितम्बर 2016   |  शैलेन्द्र दीक्षित   (145 बार पढ़ा जा चुका है)

दिनांक28अप्रैल2015


एक वर्ष पहले इस देश में एक ऐतिहासिक परिवर्तन हुआ , जब १६वीं लोकसभा का चयन हुआ , एक नयी सरकार चयनित हुई और देश में एक विचित्र लहर और ऊर्जा का संचार हुआ , घोटालों की चली आ रही एक सतत श्रखंला को फिलहाल एक विराम लगा , लोगों ने कुछ स्वप्न देखे , एक मूक कार्यालय में मानो प्राण संचारित हो उठे , जो कार्यालय कभी कठपुतली का रंगमंच बना हुआ था वहाँ एक योगी ने प्रवेश किया और स्वयं की कार्यशैली से प्रेरित करते हुए एक सोयी हुई व्यवस्था को जगाने का सफल काम किया


बीच बीच में उसके कुछ सहयोगियों ने भयंकर त्रुटियाँ की , जिससे समुदाय विशेष की भावनाएं आहत हुई चाहे वह कुछ मूर्ख बयान रहे हों या फिर कश्मीर की सत्ता , या फिर दिल्ली चुनाव की शर्मनाक हार पर फिर भी कुछ खट्टे मीठे अनुभवों के साथ राष्ट्र ने दस वर्षीय उदासीनता का चोला उतार फेंका और वैश्विक पटल पर भारत के प्रधानमंत्री की छवि कमजोर से सर्वाधिक सशक्त नेता की बन गयी , यह एक ऐसी उपलब्धि है जिसको हर भारत वासी चाहे वो भक्त हो , खानदानी गुलाम हो या अभी की क्रान्ति के फैशन में बना हुआ नया नया इंकलाबी हो सबको गर्व होना चाहिए !


एक वर्ष पहले एक व्यक्ति ने देश में पहली बार कुछ सार्थक वादों की श्रृंखला रखी जिसमे विकास को अगले पायदान पर स्थान दिया गया ! भारत एक ऐसी विविधता वाला देश है जो एक समय झुग्गी झोपडियों का देश भी है वहीं साथ ही आर्थिक जगत में अनेक श्रेणियों में बटें हुए देशों की श्रृंखला में प्रथम श्रेणी का विकासशील देश है जो विकास के स्वप्न तो देख रहा है पर उसकी रास्ते के रोडे अभी दूर नहीं हुए , शायद विकास के वादे करते समय उन अवरोधों को नजरंदाज कर दिया गया


हम सभी चाहते हैं कि देश में नदियों को आपस में जोड़ दिया जाए जिससे एक ओर बाढ़ की विनाशलीला थम जाए दूसरी ओर सूखाग्रस्त इलाको में जल की धारा बह चले .. पर इन्हें जोड़ने वाली नहरे कहा बने ये किसी ने नहीं सोचा , शायद प्रधानमंत्री ने भी नहीं सोचा था

हम सभी चाहते हैं कि देश के हर हिस्से में विद्युत की सुविधा का प्रचार प्रसार हो ताकि हर घर में उजियारा हो सके पर उसके संचरण की व्यवस्था कैसे होगी यह किसी ने नहीं सोचा .. शायद प्रधानमंत्री ने भी नहीं सोचा था

हम सभी चाहते है कि देश का कोना कोना सुगम्य बने , उत्तम श्रेणी के राष्ट्रीय राजमार्ग बने पर ये मार्ग कहा बनें यह किसी ने नहीं सोचा .. शायद प्रधानमंत्री ने भी नहीं सोचा था

हम सभी चाहते हैं कि देश में त्वरित गति से दौड़ने वाली बुलेट ट्रेन हो , पर वे ट्रेन चलेंगी किन पटरियों पर यह किसी न नहीं सोचा .. शायद प्रधानमंत्री ने भी नहीं सोचा था


मैं बस ये कल्पना कर रहा हूँ कि जिन देशों ने इन सभी क्षेत्रो में तरक्की कर ली है उनके नेतृत्व के पास कौन सी जादू की छड़ी थी या देश के नागरिको में एक उच्च स्तरीय विकासवादी सोच रही होगी जिससे उन्होंने समय रहते यह सब हासिल कर लिया ... या फिर वहाँ भारत की तरह भावनात्मक सोच वाली जनता नहीं रही होगी जो कुछ तात्कालिक लाभों की अनाश्यक जिद में दूरगामी विकास के प्रयास को बस एक स्वप्न बना रहने देंगे अब जब हवा में नहरे सडकें रेल की पटरियां बिछ जायेंगी तब विकास जरूर होगा तब तक रुकावट के लिए खेद है!


शैलेन्द्र दीक्षित

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