फटी हुई चादर

18 अक्तूबर 2016   |  डॉ हरेश परमार   (305 बार पढ़ा जा चुका है)

फटी हुई चादर

ठण्ड रात थी

उनकी चादर फटी हुई थी,

चादर कंप कंपा रही थी,

कभी इधर-कभी उधर लुढ़क रही थी.

बस सिर्फ चादर फटी हुई थी,

गहरी अँधेरी रात थी,

ठण्ड उससे भी ज्यादा ढीठ थी....

रात जितनी लंबी थी, उससे भी ज्यादा लंबी हो रही थी

चादर फटी हुई थी...

नींद आँखों में होते हुए भी

ठंडे तारों को देख रही थी...

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डॉ हरेश परमार
19 अक्तूबर 2016

जी धन्यवाद

kalpana bhatt
18 अक्तूबर 2016

अच्छे बिम्ब । प्रणाम आदरणीय

kalpana bhatt
18 अक्तूबर 2016

अच्छे बिम्ब । प्रणाम आदरणीय

डॉ हरेश परमार
09 दिसम्बर 2016

धन्यवाद

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